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जय शची नंदन जय गौर हरि | विष्णुप्रिया प्राणधन नदिया बिहारी सुंदर पद

जय प्राणधन निताई-गौर, शची मैया के लाल,
करुणा बरसाएँ जगत में, हरें भव का जंजाल।
स्वर्णिम तन, मधुर मुस्कान, प्रेम रस की धार,
नाम संग कीर्तन कराएँ, खोलें मुक्ति द्वार॥

जय शची नंदन जय गौर हरि, विष्णुप्रिया प्राणधन,
नदिया बिहारी दयामय, हरें जगत का क्रंदन।
स्वर्णिम रूप, करुणा सिंधु, प्रेम सुधा बरसाएँ,
हरि नाम संकीर्तन देकर, जीवन सफल बनाएँ॥

१
गौरांग रूप सुहावना, प्रेम सुधा बरसाए।
नाम संकीर्तन रटत जो, भवसागर तर जाए॥

२
गौर हरि की करुणा बड़ी, जग में दीन्हा प्रेम।
निताई संग हरिनाम दे, मिटा दिए सब क्षेम॥

३
गौर चाँद की चाँदनी, हर ले मन का भार।
राधा भाव में डूबकर, बाँटे प्रेम अपार॥

४
नयनन नीर बहाय के, बोले हरि का नाम।
गौर हरि की प्रीति से, पावन होय जहान॥

५
राधा भाव दयामय, धरे गौर अवतार।
नाम प्रेम का दान दे, किया जगत उद्धार॥

🌼 प्रेममयी दोहे

१
गौर कृपा की धार से, भीजत सकल जहान।
नाम प्रेम बरसावतें, दयामय भगवान॥

२
राधा भाव में डूबकर, आए गौर दयाल।
नाम सुधा बरसा गए, मिटे भवसंकट जाल॥

३
गौर प्रेम की एक बूँद, पाए जो इंसान।
रोम रोम हरि नाम कहे, होय अमृत समान॥

४
निताई संग गौर हरि, बाँटत प्रेम अपार।
जिनने नाम को थाम लिया, तिनका भव पार॥

५
गौर दया की छाँव में, मिटे हृदय का शोक।
नाम संकीर्तन करिए, कटे जन्म का रोक॥


🌼 रूपमयी दोहे

१
गौर अंग की कान्ति से, लजत कोटि चंद।
नयन कमल मुस्कान मधुर, मोहें सकल आनंद॥

२
गौर तनु स्वर्णिम झलके, शोभा अपरम्पार।
देखत ही मन हरि लिया, प्रेम भयो अपार॥

३
लम्बी भुजा विशाल तन, लोचन प्रेम विहार।
गौर रूप रस में डूबकर, जग हो गया उदार॥

४
गौर मुख चंद्रिका झरे, अधर नाम रस धार।
देखत ही हिय हरि गए, मिटे भवसंकट भार॥

५
रूप सुधा के सागर हैं, गौर हरि भगवान।
दर्शन पाकर प्रेम से, पुलकित होय जहान॥

🌼 प्रेममयी दोहे

१
गौर दया की धार से, भीजत जग संसार।
नाम प्रेम बरसा दिए, खोल दिए उद्धार॥

२
निताई संग गौर हरि, दीनन के रखवारे।
नाम प्रेम का दान दे, तारें जीव हमारे॥

३
गौर प्रेम की एक बूँद, पावै जो इंसान।
रोम रोम हरि नाम कहे, बन जाए भगवान॥

४
राधा भाव समेटकर, आए गौर दयाल।
हरिनाम की ज्योत से, हर लें जग का जाल॥

५
गौर कृपा की छाँव में, मिटे हृदय संताप।
नाम संकीर्तन कीजिए, कट जाए सब पाप॥

६
निताई बोले प्रेम से, लो हरिनाम पुकार।
गौर संग जो जुड़ गया, उसका भव पार॥

७
गौर नाम की धुन लगी, मिटे मनो विकार।
प्रेम सुधा बरसाइ के, करें जीव उद्धार॥

८
गौर कृपा जिस पर पड़े, मिटे जगत का मोह।
हरि नाम में डूबकर, पाए प्रेम का सोह॥

९
गौर नयन से बहत जल, प्रेम रस की धार।
देखत ही हिय पिघल जाए, मिटे भव अंधकार॥

१०
निताई गौर की शरण में, पाए प्रेम अपार।
नाम जपो मन भाव से, कटे जन्म का भार॥


🌼 रूपमयी दोहे

११
गौर अंग की कान्ति से, लजत कोटि चंद।
स्वर्णिम देह दिपाय के, भरें प्रेम आनंद॥

१२
लम्बी भुजा विशाल तन, नयन कमल रसधार।
गौर रूप के दर्शन से, मिटे हृदय अंधकार॥

१३
गौर मुख चंद्र समान, अधर हरि गुण गान।
देखत ही मन हरि लिया, बन जाए बलिहान॥

१४
स्वर्ण प्रभा तन झलमले, गौर रूप मनमोहन।
दर्शन करते ही लगे, जैसे मिले मधुसोहन॥

१५
गौर तनु की ज्योति से, जगमग भयो जहान।
देखत ही हरि स्मरण हो, पुलकित होवे प्राण॥

१६
नयन कमल मुस्कान मधुर, अधर नाम रसधार।
गौर रूप रस में डूबकर, भूल गया संसार॥

१७
केश घनश्याम लहरते, तन स्वर्णिम आभास।
गौर रूप की छवि देख, हरषित होवे श्वास॥

१८
गौर अंग की दीप्ति से, झुकत देव समाज।
दर्शन पाकर प्रेम से, मिटे हृदय का काज॥

१९
गौर मुख की चंद्रिका, बरसे प्रेम अपार।
देखत ही मन हरि गया, रह गया संसार॥

२०
गौर रूप अमृत सुधा, देखे जो एक बार।
भूल जाए जग मोह सब, लगे हरि दरबार॥

१
गौर अंग स्वर्णिम झलके, निताई श्याम सुहाय।
दोउ भ्राता की छवि देख, प्रेम सुधा बरसाए॥

२
लम्बी भुजा निताई की, गौर तनु उजियार।
नाम संकीर्तन करित जब, नाचे जग संसार॥

३
गौर मुख चंद्र समान, निताई नयन विशाल।
दर्शन करते ही मिटे, भवसागर का जाल॥

४
निताई हँसत दयालुता, गौर करुणा धाम।
दोउ की छवि मन मोहनी, हर ले सब अभिमान॥

५
स्वर्ण प्रभा गौरांग की, निताई प्रेम अपार।
दर्शन से ही जीव को, मिल जाए भव पार॥

६
गौर अधर हरिनाम रस, निताई कर विस्तार।
दोउ की मधुर मुस्कान से, हरषित त्रिभुवन सार॥

७
निताई की असीम कृपा, गौर प्रेम भंडार।
दोउ के दर्शन मात्र से, मिटे हृदय अंधकार॥

८
गौर रूप रस सागर, निताई दया निवास।
देखत ही मन हरि लिया, भर गया उल्लास॥

९
दोउ भुजा उठाय के, बोले हरि का नाम।
निताई-गौर की छवि से, पावन भयो धाम॥

१०
निताई गौर की झाँकी, प्रेम सुधा की धार।
दर्शन पाकर भक्त जन, होवें पुलक अपार॥

निताई–गौर रूप वर्णन दोहे

१
गौर कांति कनक सम, निताई श्याम सुहाय।
दोउ भ्राता की छवि देख, प्रेम सुधा बरसाए॥

२
लम्बी भुजा उठाय के, बोले हरि का नाम।
निताई-गौर नाचत रहें, पावन हो सब धाम॥

३
गौर मुख चंद्रमाँ समान, निताई नयन विशाल।
दर्शन करते ही मिटे, भवसागर का जाल॥

४
निताई हँसत दयालुता, गौर प्रेम रसधार।
दोउ की मधुर मुस्कान से, हरषित संसार॥

५
स्वर्ण देह गौरांग की, निताई करुणा सागर।
दर्शन करते भक्त जन, हो जाते प्रेम मगन॥

६
निताई की असीम कृपा, गौर प्रेम भंडार।
दोउ की झाँकी देख कर, मिटे हृदय अंधकार॥

७
गौर अधर हरिनाम रस, निताई प्रेम विहार।
दोउ की छवि मन मोहनी, करे जीव उद्धार॥

८
निताई गौर की झलक से, पुलकित हो तन-प्राण।
हरि नाम की धुन लगे, मिटे भव का त्राण॥

९
गौर कांति जगमग करे, निताई दया अपार।
दोउ के चरणन में मिले, प्रेम सुधा अपार॥

१०
निताई गौर सुंदर छवि, मन को करे विह्वाल।
देखत ही हरि स्मरण हो, मिटे जगत का जाल॥

११
गौर चंद्र की चाँदनी, निताई प्रेम उजास।
दोउ की छवि मन हरि ले, भर दे हृदय प्रकाश॥

१२
निताई गौर की जोड़ी, अद्भुत दिव्य स्वरूप।
दर्शन पाकर भक्त जन, हो जाएँ प्रेम रूप॥

🌼 निताई–गौर चरण महिमा दोहे

१
निताई-गौर चरण में, शीतल प्रेम निवास।
जिनने शरण अपनाई, मिटे जन्म की त्रास॥

२
गौर चरण रज एक कण, पावन करे जहान।
जिसे मिले वह धन्य है, पाए हरि का ज्ञान॥

३
निताई चरण कृपा सदा, दीनन के रखवारे।
जिनने चरणन को धरा, भवसागर से तारे॥

४
गौर चरण की धूल से, पवित्र भयो संसार।
नाम प्रेम का दान दे, करते जीव उद्धार॥

५
निताई-गौर चरण युगल, भक्तन का आधार।
जिन पर सिर धर दीजिए, कट जाए संसारी भार॥

६
गौर चरण की शरण में, मिले प्रेम अपार।
नाम संकीर्तन करते ही, हो भवसागर पार॥

७
निताई चरण कमल में, दया सदा विस्तार।
एक बार जो झुक गया, उसका भयो उद्धार॥

८
गौर चरण की चाँदनी, हर ले मन का शोक।
भक्त हृदय में बस गए, मिटा दिए सब रोग॥

९
निताई-गौर चरण युगल, अमृत रस की खान।
जिनने मन से वंदना की, पावन भयो प्राण॥

१०
चरण कमल निताई-गौर, भव भय हरने हार।
भक्त जनों के जीवन में, बरसाएँ प्रेम अपार॥

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