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प्रेमभक्ति-चन्द्रिका श्रीनरोत्तम ठाकुर विरचित

प्रेमभक्ति-चन्द्रिका

(श्रीनरोत्तम ठाकुर विरचित)

अज्ञान-तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।१।।

श्रीचैतन्यमनोऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले । सोऽयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्वपदान्तिकम् ।।२।।

श्रीगुरु चरण पद्म, केवल भगति सद्म, वन्दौं मुञ्जि सावधान मने ।

याँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया याई, कृष्ण प्राप्ति हय याँहा हने ।।

गुरु मुख पद्म-वाक्य, हृदय करिया ऐक्य, आर न करिह मने आशा ।

श्रीगुरु चरणे रति, एइ से उत्तम गति, से प्रसादे पुरे सर्व आशा ।।

चक्षुदान दिला येई, जन्मे-जन्मे प्रभु सेइ, दिव्यज्ञान हृदे प्रकाशित ।

प्रेमभक्ति याहा हइते, अविद्या विनाश याते, वेदे गाय याहार चरित ।।

श्रीगुरु करुणासिन्धु, अधम जनार बन्धु, लोकनाथ लोकेर जीवन ।

हा ! हा ! प्रभु कर दया, देह मोरे पदछाया, एवे यश घूषुक त्रिभुवन ।।

वैष्णव-चरणरेणु, भूषण करिया तनु, याहा हइते अनुभव हय ।

मार्जन हय भजन, साधुसङ्गे अनुक्षण, अज्ञान-अविद्या पराजय ।।

जय सनातन-रूप, प्रेम भक्ति-रस कूप, युगल-उज्ज्वल रस तनु ।

 याहार प्रसादे लोक, पाशरिल दुख शोक, प्रकटे कलपतरु जनु ।।

प्रेमभक्ति रीति यत, निजग्रन्थे सुवेकत, लिखियाछे दुई महाशय,

याहार श्रवण हैते, परानंद हय चिते, युगल मधुर रसाश्रय ।।

युगल किशोर-प्रेम, लक्षवान येन हेम, हेन धन प्रकाशिला यारा ।

जय रूप सनातन, देह मोरे एइ धन, से रतन मोर गले हारा ।।

भागवत शास्त्र मर्म, नवविध भक्तिधर्म, सदाई करिव सुसेवन ।

अन्य देवाश्रय नाई, तोमारे कहिन भाई, एइ भक्ति परम कारण ।।

साधु-शास्त्र-गुरु वाक्य, हृदय करिया ऐक्य, सतत भासिव प्रेम माझे ।

कर्मी ज्ञानी भक्तिहीन, इहारे करिव भिन्न, नरोत्तम एइ तत्व गाजे ।।

अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् ।

अनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ।। श्लोक नं. ३

अन्य अभिलाष छाड़ि, ज्ञान-कर्म परिहरि, काय मने करिया भजन ।

साधु संगे कृष्ण-सेवा ना पूजिव देवी-देवा, एइ भक्ति परम कारण ।।

महाजनेर येइ पथ, ताते हवे अनुरत, पूर्वापर करिया विचार ।

साधन-स्मरण लीला, इहाते ना कर हेला, काय-मने करिया सुसार ।।

असत्-सङ्ग सदा त्याग, छाड़ अन्य गीतराग, कर्मी ज्ञानी परिहरि दूरे ।

केवल भगत सङ्ग, प्रेम कथा रस रङ्ग, लीला कथा व्रजरसपूरे ।।

योगी न्यासी कर्मी ज्ञानी, अन्य देवपूजक ध्यानी एइ लोके दूरे परिहरि ।

धर्म कर्म दुःख शोक, येवा थाके अन्य योग, छाड़ि भज गिरिवर-धारी ।।

तीर्थयात्रा परिश्रम, केवल मनेर भ्रम, सर्वसिद्धि गोविन्द चरण ।

सुद्दढ़ विश्वास करि, मद-मात्सर्य परिहरि, सदा कर अनन्य-भजन ।।

कृष्णभक्त अङ्ग हेरि, कृष्णभक्त सङ्ग करि, श्रद्धान्वित श्रवण-कीर्त्तन ।

अर्चन स्मरण ध्यान, नवभक्ति महाज्ञान, एइ भक्ति परम कारण ।।

हृषीके गोविन्द सेवा, ना पूजिव देवी-देवा, एइ त अनन्य भक्ति कथा ।

आर यत उपालम्भ, विशेष सकलि दम्भ, देखिते लागये बड़ व्यथा ।।

देहे वैसे रिपुगण, यतेक इन्द्रियगण, केहो कारो बाध्य नाहि हय ।

शुनिले न शुने कान, जानिले न जाने प्रान, द्दढ़ाइते ना पारे निश्चय ।।

काम क्रोध लोभ मोह, मद मात्सर्य दम्भ सह, स्थाने-स्थाने नियुक्त करिव ।

आनन्द करि हृदय, रिपु करि पराजय, अनायासे गोविन्द भजिव ।।

कृष्णसेवा कामार्पणे, क्रोध भक्तद्वेषिजने, लोभ साधुसङ्गे हरिकथा ।

मोह इष्ट लाभ विने, मद कृष्ण गुणगाने, नियुक्त करिव यथा तथा ।।

अन्यथा स्वतन्त्र काम, अनर्थादि यार धाम, भक्तिपथे सदा सेई भङ्गे ।

किवा से करिते पारे, काम क्रोध साधकेरे, यदि हय साधुजनार सङ्गे ।।

क्रोधे वा ना करे किवा, क्रोध त्याग सदा दिवा, लोभ मोह एइत कथन ।

छय रिपु सदा हीन, करिए मनेर आधीन, कृष्णचन्द्र करिया स्मरण ।।

आपनि पलावे सव, शुनिया गोविन्द रव, सिंह रवे येन करिगण ।

सकल विपत्ति जावे, महानन्द सुख पावे, यार हय एकान्त भजन ।।

ना करिह असत् चेष्टा, लाभ पूजा प्रतिष्ठा, सदा चिन्ता गोविन्द चरण ।

सकल विपत्ति जावे, महानन्द सुख पावे, प्रेम-भक्ति परम कारण ।

असत् क्रिया कुटिनाटी, छाड़ अन्य परिपाटी, अन्य देवे ना करिह रति ।

आपन-आपन स्थाने, पिरीति सभाई टाने, भक्तिपथे पड़ये विपत्ति ।।

आपन भजन पथ, ताहे हव अनुरत, इष्टदेव स्थाने लीला गान ।

नैष्ठिक भजन एइ, तोमारे कहिल भाई, हनुमान ताहाते प्रमाण ।।

श्रीनाथे जानकीनाथे आभेदः परमात्मनि ।

तथापि मम सर्वस्वं रामः कमललोचनः । । श्लोक नं.4

देवलोके पितृलोके, पाय तारा महासुख, साधु-साधु बले अनुक्षण ।

युगल-भजन यारा प्रेमानन्दे भासे तारा, त्रिभुवने ताहार निछनि ।।

पृथक् आवास योग, दुखमय विषय भोग, व्रजधाम गोविन्द-सेवन ।

कृष्ण कथा कृष्णनाम, सत्य सत्य रसधाम, व्रज जनेर सङ्ग अनुक्षण ।।

सदा सेवा अभिलाष, मने करि विसोवास, सर्वथाइ हइया निर्भय ।

नरोत्तम दास बोले, पड़िनु असत-भोले, गरित्राण कर महाशय ।। पद नं. २

तुमि त दयार सिन्धु, अधम जनार बन्धु, मोरे प्रभु ! कर अवधान ।

पड़िनु असत्-भोले, काम तिमिङ्गिले-गिले, ओ हे नाथ! कर परित्राण ।।

पाषण्ड जनम मोर, अपराधे हैनु भोर, निष्कपटे ना भजिनु तोमा ।

तथापि तुमि से गति, ना छाड़िह प्राणपति, आमा सम नाहिक अधमा ।।

पतित-पावन नाम, घोषणा तोमार श्याम । उपेखिले नाहि मोर गति ।

यदि हइ अपराधी तथापिहु तुमि गति, सत्य-सत्य येन सती-पति ।।

तुमि न परम देवा, नाहि मोरे उपेखिवा, शुन शुन प्राणेर ईश्वर ।

यदि करों अपराध, तथापिह तुमि नाथ, सेवा दिया कर अनुचर ।।

कामे मोर हत चित, नाहि जाने निज हित, मनेर ना घूचे दुर्वासना ।

मोरे नाथ ! अङ्गी करु, ओ हे वांछा-कल्पतरु, करुणा देखुक सर्वजना ।।

मो सम पतित नाई, त्रिभुवने देख चाइ, नरोत्तम-पावन नाम धर ।

घुषुक संसारे नाम, पतित-पावन श्याम, निज दास कर गिरिधर ।।

नरोत्तम बड़ दुखी, नाथ! मोरे कर सुखी, तोमार भजन-संकीर्त्तन ।

अन्तराय नाहि पाय, एइ त परम भय, निवेदन करों अनुक्षण ।। पद नं. ३

आन कथा आन व्यथा, नाहि येन जाऊँ तथा, तोमार चरणस्मृति साजे ।

अविरत अविकल, तूया गुणेन कल-कल, गाइ येन सतेर समाजे ।।

अन्य व्रत अन्य दान, नाहि करों वस्तु-ज्ञान, अन्य सेवा अन्य देवपूजा ।

हा हा कृष्ण बलि-बलि, बेड़ाव आनन्द करि, मने मोर नाहि येन दूजा ।।

जीवने मरणे गति, राधाकृष्ण प्राण-पति, दुहार पिरीति रस सुखे ।

युगल-भजन यारा, मोर प्राण गले हारा, एइ कथा रहु मोर बुके ।।

युगल चरण सेवा, युगल चरण-ध्येवा, युगलेते मनेर पिरीत ।

युगल-किशोर रूप, काम-रतिगण-भूप, मने रहु ओ लीला किरीति ।।

दशनेते तृण धरि, हा हा ! किशोर-किशोरी ! चरणाब्जे निवेदन करि ।

व्रजराजकुमार श्याम, वृषभानु कुमारी नाम, श्रीराधिका नाम मनोहारी ।।

कनक-केतकी राइ, श्याम मरकत काइ, दरप-दरप कर चूर ।

नटवर शिरोमनि, नटनीर सिखरिणी, दुहु गुणे दुहुँ मन भूर ।।

श्रीमुख सुन्दर वर, हेम नील कान्तिधर, भावभूषण करु शोभा ।

नील-पीत वासधर, गौरी श्याम मनोहर, अन्तरेर भावे दोहे लोभा ।।

आभरण मणिमय, प्रति अङ्गे अभिनय, कहे दीन नरोत्तम दास ।

निशि दिशि गुण गाऊँ, परम आनन्द पाऊँ, मने मोर एइ अभिलाष ।। पद नं. ४

रागेर भजन पथ, कहि एवे अभिमत, लोक-वेद-सार एइ वाणी ।

सखीर अनुगा हैया, व्रजे सिद्ध देह पाइया, एइ भावे जुड़ावे परानी ।।

श्रीराधिकार सखी यत, ताहा वा कहिव कत, मुख्य सखी करिये गणन ।

ललिता विशाखा तथा, सुचित्रा चम्पकलता रङ्गदेवी सुदेवी कथन ।।

तुङ्गविद्या इन्दुलेखा, एइ अष्ट सखी लेखा, एवे कहि नर्म सखीगण ।

श्रीराधिका-सहचरी, प्रिय-प्रेष्ठ नाम धरि, प्रेम सेवा करे अनुक्षण ।।

समस्नेहा विषम स्नेहा, ना करिह दुइ लेहा, कहि मात्र अधिक स्नेहागण ।

निरन्तर थाके संगे, कृष्ण कथा लीलारंगे, नर्म सखी एइ सर्व जन ।।

श्रीरूप मंजरी सार, श्रीरति मंजरी आर, अनङ्ग मञ्जरी मञ्जुलाली ।

श्रीरस मंजरी संगे, कस्तुरिका आदि रंगे, प्रेम सेवा करे कुतूहली ।।

ए सभार अनुगा हैया, प्रेमसेवा निव चाइया, इङ्गिते बुझिव सब काजे ।

रूपे गुणे डगमगि, सदा हब अनुरागी, वसति करिव सखी माझे ।।

वृन्दावने दुइजन, चारिदिके सखीगण, समयेर सेवा रस-सुखे ।

सखीर इङ्गित हवे, चामर ढुलाव कवे, ताम्बूल योगाव चाँदमुखे ।।

युगल चरण सेबि, निरन्तर एइ भावि, अनुरागे थाकिव सदाय ।

साधने भाविव याहा, सिद्ध देहे पावे ताहा, राग पथेर एइ से उपाय ।।

साधने ये धन चाई, सिद्धदेहे ताहा पाइ, पक्वापक्व मात्र से विचार ।

पाकिले से प्रेमभक्ति, अपक्वे साधन रीति, भक्तिलक्षण तत्त्वसार ।।

नरोत्तम दास कहे, एइ येन मोर हये, व्रजपुरे अनुराग वासे ।

सखीगण-गणनाते, आमारे गणिवे ताते, तबहि पूरिव अभिलाषे ।। पद नं. ५

सखीनां सङ्गिनीरूपामात्मानं वासनामयीम् ।

आज्ञा-सेवापरां तत्तत् कृपालङ्कारभूषिताम् ।।

कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निज समीहितं ।

तत्तत् कथा-रसश्चासौ कुर्याद् वासं व्रजे सदा ।। श्लोक नं. ५

युगल चरण प्रीति, परम आनन्द तथि, रति प्रेममय परबन्धे ।

 कृष्णनाम राधानाम, उपासना रसधाम, चरणे पड़िया परानन्दे ।।

मनेर स्मरण प्राण, मधुर मधुर नाम, युगल विलास स्मृति सार ।

साध्य साधन एई, इहा वइ आर नाइ, एइतत्व सर्वविधि सार ।।

जलद सुन्दर कांति, मधुर मधुर भाँति, वेदगति, अवधि सुवेश ।

पीतवसनधर, आभरण मणिमय, मयूर चन्द्रिका करु केश ।।

मृगमद चन्दन, कुंमकुम विलेपन, मोहन मूरति त्रिभङ्ग ।

नवीन कुसुमावली, श्रीअंगे शोभये भालि, मधुलोभे फिरे मत्त भृङ्ग ।।

ईषत मधुर स्मित्, वेदगधि लीलामृत, लुबधल व्रजवधू वृन्दे ।

चरण-कमल पर, मणिमय नूपुर, नखमणि झलमल चन्द्रे ।।

नूपुर मुरलि ध्वनि, कुलवधु मरालिनी, शुनिया रहिते नारे घरे ।

हृदये बाढ़ये रति, येन मिले पति सती, कुलेर धर्म जाय दूर ।।

शीतल किरण कर, कल्पतरु गुणधर, तरुलता पऋतु शोभा ।

गोविन्द आनन्दमय, निकटे वनिताचय, मधुर विहार अति लोभा ।।

व्रजपुर वनितार, चरण आश्रय सार, कर मन एकान्त करिये ।

अन्य वोल गण्डगोल, ना शुनिह उत्तरोल, राख प्रेम हृदय भरिये ।।

पाप-पुण्यमय देह, सकलि अनित्य एह, धन जन सब मिछा धन्ध ।

मरिले याइवे कोथा, इहाते ना पाओ व्यथा, तबु निति कर कार्य मन्द ।।

राजार ये राज्यपाट, येन नाटुयार नाट, देखिते देखिते किछु नय ।

हेन माया करे येइ, परम उत्तम सेई, तारे मन सदा कर भय ।।

पापे ना करिह मन, अधम से पापीजन, तारे मन दूरे परिहरि ।

पुण्य ये सुखेर धाम, तार ना लइह नाम, पुण्य मुक्ति दुई त्याग करि ।।

प्रेम भक्ति सुधा निधि, ताहे डूब निरवधि, आर यत क्षारनिधि प्राय ।

निरन्तर सुख पावे, सकल सन्ताप जावे, परतत्व कहिल उपाय ।।

अन्येर परश येन, नहे कदाचित हेन, इहाते हइवे सावधान ।

राधाकृष्ण नाम गान, एइ से परम ध्यान, आर ना करिह परमाण ।।

कर्मी ज्ञानी मिश्र भक्त, ना हवे ताते अनुरक्त विशुद्ध भजन कर मन ।

व्रज जनेर येइ रीत, ताहाते डुबाओ चित, एइ से परम तत्व धन ।।

प्रार्थना करिव सदा, शुद्ध भावे प्रेम-कथा, नाम-मन्त्रे करिया अभेद ।

आस्तिक करिया मन भज राङ्गा श्रीचरण, ग्रन्थि पापे हवे परिच्छेद ।।

राधाकृष्ण-सेवन, एकान्त करिया मन, चरण कमल वलि जाऊँ ।

दुई नाम शुनि शुनि, भक्तमुखे पुनि पुनि, परम आनन्द सुख पाऊँ ।।

हेम-गौरी तनु राई, आंखि दरशन चाइ, रोदन करिव अभिलाषे ।

जलधर ढर-ढर अङ्ग अति मनोहर, रूपे गुणे भुवन प्रकाशे ।।

सखीगण चारि पाशे, सेवा करे अभिलाषे, परम से सेवा सुख धरे ।

एइ मन तनु मोर, एइ रसे हैया भोर, नरोत्तम सदाइ विहरे ।। पद नं. ६

राधाकृष्ण करो ध्यान, स्वप्ने ना बोलो आन, प्रेम बिना आन नाहि चाउँ ।

युगल किशोर-प्रेम, लक्षवाण हेम एन, आरति पिरीति रस ध्याउँ ।।

जल विनु येन मीन, दुख पाय आयुहीन, प्रेम विना सेइ मत भक्त ।

चातक जलद-गति, एमति एकान्त रीति, जाने येइ सेइ अनुरक्त ।।

लुबध भ्रमरा येन, चकोर चन्द्रिका तेन, पतिव्रता जनेर येन पति ।

अन्यत्र ना चले मन, येन दरिद्रेर धन, इए मत प्रेम भक्ति रीति ।।

विषय गरल मय, ताते मान सुखचय, सेई सुख दुख करि मान ।

गोविन्द विषय रस, सङ्ग कर तार दास, प्रेमभक्ति सत्य करि जान ।।

मध्ये मध्ये आछे दुष्ट, दृष्टि करि हव रुष्ट, गुण के विगुण करि माने ।

गोविन्द, विमुखजन, स्फूर्ति नहे हेन धन, लौकिक करिया सब जाने ।।

अज्ञान विमुग्ध यत, नाहि लय सत-मत, अहंकारे ना जाने आपना।

अभिमानी भक्तिहीन, जग माझे सेई दीन, वृथा तार से अशेष भावना ।।

आर सब परिहरि, परम ईश्वर हरि, सेव मन ! प्रेम करि आशे ।

एक व्रजराज पुरे, गोविन्द रसिकवरे, करह सदाइ अभिलाषे ।।

नरोत्तम दास कहे, सदा मोर प्राण देहे. हेन भक्त सङ्ग ना पाइया ।

अभाग्येर नाहि ओर, मिच्छाइ हइनु भोर, दुख बहु अन्तरे जागिया ।। पद नं. ७

वचनेर अगोचर, वृन्दावन लीला स्थल, स्वप्रकाश प्रेमानन्दघन ।

याहाते प्रकट सुख, नाहि जरा-मृत्यु दुख. कृष्णलीला-रस अनुक्षण ।।

राधाकृष्ण दूँहु प्रेम, लक्षवान येन हेम, याहार हिल्लोल रस सिन्धु ।

चकोर नयन प्रेम, काम-रति करे ध्यान, पिरीति-सुखेर दुहु बन्धु ।।

राधिका प्रेयसीवरा, वामोदिके मनोहरा, कनक केशर-कान्ति धरे ।

अनुरागे रक्त साड़ी नीलपट्ट मनोहारी. मणिमय आभरण परे ।।

करये लोचन पान, रूप-लीला दुहुँ गान, आनन्दे मगन सहचरी ।

बेदविधि गोचर, रतन वेदीर पर, सेव नित किशोर-किशोरी ।।

दुर्लभ जनम हेन, नाहि भज हरि केन, कि लागि मरिया भववन्धे ।

छाड़ अन्य क्रियाकर्म, नाहि देख वेदधर्म, भक्ति कर कृष्णपद द्वन्दे ।।

विषय विषम मति, नाहि भज व्रजपति, कृष्ण चन्द्र चरण सुखसार ।

स्वर्ग आर अपवर्ग, संसार नरक भोग, सर्वनाश जन्म विकार ।।

देहे ना करिह आस्था, मरिले ये सम शास्ता, दुखेर समुद्र कर्मगति ।

देखिया शुनिया भज, साधुशास्त्र मत यत, युगल चरणे कर रति ।।

ज्ञान काण्ड कर्म काण्ड, केवल विषेर भाण्ड, अमृत वलिया येवा खाय ।

नाना योनि सदा फिरे, कदर्य्य भक्षण करे, तार जन्म अधः पाते याय ।।

राधाकृष्णे नाहि रति, अन्य देवे बले पति, प्रेमभक्ति रीति नाहि जाने ।

नाहि भक्तिर सन्धान, भरमे करमे ध्यान, वृथा तार अशेष भावने ।।

ज्ञान कर्म करे लोक, नाहि जाने भक्तियोग, नानामते हइया अज्ञान ।

तार कथा नाहि शुनि, परमार्थ तत्व जानि, प्रेम भक्ति भक्तगण प्राण ।।

जगत् व्यापक हरि, अज भव आज्ञाकारी, मधुर मूरति लीला कथा ।

एइ तत्व जाने येई, परम उत्तम सेइ, तार सङ्ग करिव सर्वथा ।।

परम नागर कृष्ण ताहे हव अति तृष्ण, भज तारे ब्रजभाव लैया ।

रसिक भगत सङ्गे, रहिव पीरिति रङ्गे, ब्रजपूरे वसति करिया ।।

श्रीगुरु भगतजन, ताहार चरणे मन, आरोपिया कथा अनुसारे ।

सखीर सर्वदा मन, हइया ताहार यूथ, सदाई विहरे ब्रजपुरे ।।

लीलारस सदा गान, युगलकिशोर प्राण, प्रार्थना करिव अभिलाषे ।

जीवने मरणे एइ, आर किछु नाहि चाई, कहे दीन नरोत्तम दासे ।। पद नं. ८

आन कथा ना बलिव, आन कथा नाशुनिव, सकलि करिव परमार्थ ।

प्रार्थना करिव सदा, लालसा अभीष्ट कथा, इहा विना सकलि अनर्थ ।।

ईश्वरेर तत्व यत, ताहा वा कहिव कत, अनन्त अपार के वा जाने ।

ब्रजपुरे प्रेम सत्य, एइ से परम तत्व, भज भज अनुराग मने ।।

गोविन्द गोकुल-चन्द्र, परम आनन्द कन्द, परिवार गोपगोपी सङ्गे ।

नन्दीश्वर यार धाम, गिरिधारी यार नाम, सखी संगे तारे भज रंगे ।।

प्रेमभक्ति तत्व एई, तोमारे कहिनु भाई, आर दुर्वासना परिहरि ।

श्रीगुरु प्रसादे भाई, एसब भजन पाई, प्रेम भक्ति सखी अनुचरी ।।

सार्थक भजन पथ, साधु संगे अविरत, स्मरण भजन कृष्णकथा ।

प्रेमभक्ति हय यदि, तवे हय मनशुद्धि, तबे याय हृदयेर व्यथा ।।

विषय विपत्ति जान, संसार स्वपन मान, नरतनु भजनेर मूल ।

अनुरागे भज सदा, प्रेम भावे लीला कथा, आर यत हृदयेर शूल ।।

राधिका चरणरेणु, भूषण करिया तनु, अनायासे पावे गिरिधारी ।

राधिका चरणाश्रय, ये करे से महाशय, तारे मुञ्जि जाइ बलिहारी ।।

जय जय राधा-नाम, वृन्दावन यार धाम, कृष्णसुख विलासेर-निधि ।

हेन राधागुण-गान, ना सुनिले मोर कान, वञ्चित करिल मोरे विधि ।।

तार भक्त-संगे सदा, रसलीला-प्रेम कथा, ये करे से पाय घनश्याम ।

इहाते विमुख जेई, तारकभु सिद्धि नाहि, ना शुनिये तार येन नाम ।।

कृष्णनाम गाने भाई, राधिका-चरण पाई, राधानाम गाने कृष्ण चन्द्र ।

संक्षेपे कहिनु कथा, घुचाओ मनेर व्यथा, दुखमय अन्य कथा द्वन्द ।।

अहंकार अभिमान, असत संग असत्-ज्ञान, छाड़ि भज गुरु पादपद्म ।

कर आत्म-निवेदन, देह-गेह परिजन, गुरुवाक्ये परम महत्व ।।

श्रीकृष्णचैतन्य देव, रति-मति तारे सेव, प्रेम कल्पतरु दाता ।

व्रजराजनन्दन, राधिकार प्राणधन, अपरूप एइ सब कथा ।।

नवद्वीपे अवतरि, राधाभाव अङ्गीकारे, ताहे कान्ति अगेर भूषण ।

तिन वाञ्छा अभिलाशी, शचीगर्भे परकाशी, संगे लइया पार्षदगण ।।

गौरहरि अवतरि, प्रेमेर बादर करि, साधिला मनेर निज काज ।

राधिकार प्राणपति कि भावे कान्दये निति, इहा बूझे भकत समाज ।।

गुपते साधिवे सिद्धि, साधन नवधाभक्ति, प्रार्थना करिव दैन्ये सदा ।

करि हरि संकीर्तन, सदाई आनन्द मन, कृष्ण बिना आर सब बाधा ।।

संसार वाटुयारे, काम-फाँसी बान्धे मारे, फुत्कार करह हरिदास ।

 करह भकत संग, प्रेम कथा नाना रंग, तबे हय विपद विनाश ।।

स्त्री-पुत्र बाँधव, यत मरि याय कत शत, आपनारे हओ सावधान ।

 मुइँ से विषम हत, ना भजिनु हरिपद, मोर आर नाहि परित्राण ।।

रामचन्द्र कविराज, सेइ संग मोर काज, तार संग विना सब शून्य ।

यदि जन्म हय पुनः, तार संग हय येन, तबे हय नरोत्तम धन्य ।। पद नं. ९

आपन भजन कथा, ना कहि यथा तथा, इहाते हइवे सावधान ।

ना करिह केह रोष, ना लइह मोर दोष, प्रणमहु भक्तेर चरण ।।

श्रीगौरांग प्रभु मोर वलान ए वाणी ।

ताहा कहि भाल-मन्द किछुई ना जानी ।।

लोकनाथ प्रभूपद हृदये विलास ।

‘प्रेमभक्ति-चन्द्रिका’ कहे नरोत्तमदास ।। पद नं. १०

।। इति श्री प्रेमभक्ति-चन्द्रिका समाप्त।।

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