प्रकृति पार परम व्योम, ज्योति अनूप अपार।
जहँ वैकुण्ठन की छटा, दिव्य अनंत विस्तार॥
अर्थ: प्रकृति से परे एक परम ज्योतिर्मय आध्यात्मिक आकाश है, जहाँ अनगिनत वैकुण्ठ धाम दिव्य आभा के साथ विराजमान हैं।
दोहा २
कृष्ण-विग्रह सम सबहि, विभुता गुणनिधि धाम।
स्वर्ग ब्रह्म लघु जानिए, वैकुण्ठन विश्राम॥
अर्थ: वे सभी धाम श्रीकृष्ण के विग्रह के समान ऐश्वर्य और गुणों से पूर्ण हैं। स्वर्ग और ब्रह्मलोक भी उनके सामने तुच्छ प्रतीत होते हैं।
दोहा ३
ताहि ऊपर कृष्णलोक, जानो परम विधान।
द्वारावति मथुरा सहित, गोकुल त्रिविध स्थान॥
अर्थ: उन सबके ऊपर परम कृष्णलोक है, जिसमें द्वारका, मथुरा और गोकुल — ये तीन प्रमुख धाम स्थित हैं।
दोहा ४
सर्वोपरि ब्रज-धाम है, प्रेम-रसिक सुखधाम।
श्वेतद्वीप गोलोक अरु, वृंदावन विश्राम॥
अर्थ: इन सबमें सर्वोच्च ब्रजधाम है, जो प्रेम-रस का मूल स्थान है। श्वेतद्वीप, गोलोक और वृंदावन उसी के दिव्य विस्तार हैं।
दोहा ५
अनंत विभु श्रीकृष्ण सम, तिनको नाहीं बंध।
ऊर्ध्वाधर व्यापत रहैं, नियम रहित आनंद॥
अर्थ: वे धाम अनंत और सर्वव्यापक हैं, श्रीकृष्ण के समान। वहाँ कोई भौतिक नियम या बंधन नहीं, केवल शुद्ध आनन्द का राज्य है।
गोलोक-तत्त्व और ब्रज-रस की महिमा
दोहा १
सब वैकुण्ठन ते परे, गोलोक धाम अपार।
जहँ निज नंदनंदन रहैं, प्रेम-रस आधार॥
अर्थ: समस्त वैकुण्ठ धामों से भी ऊपर गोलोक स्थित है। वहाँ स्वयं नंदनंदन श्रीकृष्ण अपने निज स्वरूप में प्रेम-रस के साथ विराजमान हैं।
दोहा २
नाहिं वहाँ ऐश्वर्य प्रबल, नाहिं भय की रीत।
माधुर्य-मय सब लीला वहाँ, सख्य-वात्सल्य प्रीत॥
अर्थ: गोलोक में वैकुण्ठ जैसा ऐश्वर्य-भाव प्रमुख नहीं है। वहाँ माधुर्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य-प्रेम की मधुर लीलाएँ ही प्रधान हैं।
दोहा ३
ब्रज-धूलि कण-कण सुधा, रसमय कुंज निकेत।
यमुना पुलिन निकुंज में, राधा-कृष्ण विहेत॥
अर्थ: ब्रज की धूलि का प्रत्येक कण अमृतमय है। वहाँ के कुंज, यमुना के तट और वन-उपवन सब राधा-कृष्ण की रसमयी लीलाओं से आलोकित हैं।
दोहा ४
गोपि-भाव रस-शिखर है, राधा प्रेम प्रधान।
ताहि आस्वादत कृष्ण जब, बनैं गौर भगवान॥
अर्थ: ब्रज में गोपी-भाव प्रेम का शिखर है और उसमें भी श्रीराधा का प्रेम सर्वोपरि है। उसी प्रेम के आस्वादन हेतु श्रीकृष्ण गौर रूप धारण करते हैं।
दोहा ५
गोलोकहि ब्रज नाम धरि, प्रकट भयो संसार।
जाकी छाया यह जगत, तिनकी लीला अपार॥
अर्थ: गोलोक ही ब्रज नाम से प्रकट होकर पृथ्वी पर अवतरित होता है। यह संसार उसी दिव्य धाम की छाया मात्र है, जबकि वहाँ की लीलाएँ अनंत और अप्राकृत हैं।
दोहा १
प्रकृति पार परम व्योम, ज्योति अनूप अपार।
जहँ वैकुण्ठन की छटा, दिव्य अनंत विस्तार॥
अर्थ: प्रकृति से परे एक परम ज्योतिर्मय आध्यात्मिक आकाश है, जहाँ अनगिनत वैकुण्ठ धाम दिव्य आभा के साथ विराजमान हैं।
दोहा २
कृष्ण-विग्रह सम सबहि, विभुता गुणनिधि धाम।
स्वर्ग ब्रह्म लघु जानिए, वैकुण्ठन विश्राम॥
अर्थ: वे सभी धाम श्रीकृष्ण के विग्रह के समान ऐश्वर्य और गुणों से पूर्ण हैं। स्वर्ग और ब्रह्मलोक भी उनके सामने तुच्छ प्रतीत होते हैं।
दोहा ३
ताहि ऊपर कृष्णलोक, जानो परम विधान।
द्वारावति मथुरा सहित, गोकुल त्रिविध स्थान॥
अर्थ: उन सबके ऊपर परम कृष्णलोक है, जिसमें द्वारका, मथुरा और गोकुल — ये तीन प्रमुख धाम स्थित हैं।
दोहा ४
सर्वोपरि ब्रज-धाम है, प्रेम-रसिक सुखधाम।
श्वेतद्वीप गोलोक अरु, वृंदावन विश्राम॥
अर्थ: इन सबमें सर्वोच्च ब्रजधाम है, जो प्रेम-रस का मूल स्थान है। श्वेतद्वीप, गोलोक और वृंदावन उसी के दिव्य विस्तार हैं।
दोहा ५
अनंत विभु श्रीकृष्ण सम, तिनको नाहीं बंध।
ऊर्ध्वाधर व्यापत रहैं, नियम रहित आनंद॥
अर्थ: वे धाम अनंत और सर्वव्यापक हैं, श्रीकृष्ण के समान। वहाँ कोई भौतिक नियम या बंधन नहीं, केवल शुद्ध आनन्द का राज्य है।
गोलोक-तत्त्व और ब्रज-रस की महिमा
दोहा १
सब वैकुण्ठन ते परे, गोलोक धाम अपार।
जहँ निज नंदनंदन रहैं, प्रेम-रस आधार॥
अर्थ: समस्त वैकुण्ठ धामों से भी ऊपर गोलोक स्थित है। वहाँ स्वयं नंदनंदन श्रीकृष्ण अपने निज स्वरूप में प्रेम-रस के साथ विराजमान हैं।
दोहा २
नाहिं वहाँ ऐश्वर्य प्रबल, नाहिं भय की रीत।
माधुर्य-मय सब लीला वहाँ, सख्य-वात्सल्य प्रीत॥
अर्थ: गोलोक में वैकुण्ठ जैसा ऐश्वर्य-भाव प्रमुख नहीं है। वहाँ माधुर्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य-प्रेम की मधुर लीलाएँ ही प्रधान हैं।
दोहा ३
ब्रज-धूलि कण-कण सुधा, रसमय कुंज निकेत।
यमुना पुलिन निकुंज में, राधा-कृष्ण विहेत॥
अर्थ: ब्रज की धूलि का प्रत्येक कण अमृतमय है। वहाँ के कुंज, यमुना के तट और वन-उपवन सब राधा-कृष्ण की रसमयी लीलाओं से आलोकित हैं।
दोहा ४
गोपि-भाव रस-शिखर है, राधा प्रेम प्रधान।
ताहि आस्वादत कृष्ण जब, बनैं गौर भगवान॥
अर्थ: ब्रज में गोपी-भाव प्रेम का शिखर है और उसमें भी श्रीराधा का प्रेम सर्वोपरि है। उसी प्रेम के आस्वादन हेतु श्रीकृष्ण गौर रूप धारण करते हैं।
दोहा ५
गोलोकहि ब्रज नाम धरि, प्रकट भयो संसार।
जाकी छाया यह जगत, तिनकी लीला अपार॥
अर्थ: गोलोक ही ब्रज नाम से प्रकट होकर पृथ्वी पर अवतरित होता है। यह संसार उसी दिव्य धाम की छाया मात्र है, जबकि वहाँ की लीलाएँ अनंत और अप्राकृत हैं।
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