श्रीशिक्षाष्टकम् की सातवीं श्लोक की गहराई और गंभीरता को बहुत सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है।
श्लोक है—
“दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः”
— यह शोक और आत्मनिंदा का भाव उस साधक का है जो जानता है कि हर कृपा द्वार खुल चुका है, परंतु उसका चित्त अभी भी निष्क्रिय है।
श्रीचैतन्य महाप्रभु की यह करुण पुकार इस बात की याद दिलाती है कि—
- प्रभु ने अपने नामों में अपनी सारी शक्तियाँ रख दी हैं (नाम-नामिनी नो बहुधा निज सर्व शक्तिः)
- कोई भी समय, शुद्धता, या स्थान की बाध्यता नहीं रखी (नियतः स्मरणे न कालः)
- नाम जप अत्यंत सहज, सुलभ, और मुक्त है
फिर भी यदि उस नाम में अनुराग न उत्पन्न हो तो वह केवल हमारे नाम-अपराध के कारण है।
🌿 नाम-अपराध ही है वह दुर्दैव…
श्रीमद्भागवतम्, हरिनाम चिन्तामणि, पद्मपुराण आदि शास्त्रों में नाम-अपराधों की चर्चा की गई है। इनमें प्रमुख हैं:
- भगवद्भक्तों की निंदा करना
- शिव आदि देवताओं को भगवान के सम तुल्य समझना
- गुरु की अवज्ञा करना
- वेदों के माहात्म्य का तिरस्कार करना
- पापकर्म पर भरोसा करके नाम जपना
- नाम के गुणों को किसी को न बताना
- नाम को सामान्य कर्म की तरह समझना
- बार-बार पाप कर, नाम से उसका प्रायश्चित्त करना
- नाम जप में विश्वास न करना
- नाम जप करने वाले को तुच्छ समझना
इन अपराधों से चित्त मलिन होता है, और फिर चाहे नाम कितना भी पावन हो, उसका ‘अनुभव’ नहीं हो पाता।
🔆 इसलिए भक्ति में प्रार्थना है:
“हे नाथ! मैं बार-बार प्रयास करूँगा कि मैं अपराधों से दूर रहूं, और तुम्हारे श्रीनाम में विश्वास और अनुराग उत्पन्न कर सकूं।”
🌸 एक सुंदर दोहा इस भाव के लिए:
नामहि ते न होय अनुराग,
जब तक मन बसी अपराध की छाय।
कर ले ह्रदय को निर्मल तू,
फिर नाम सुधा बरसाय।।


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