🌺🙏 सीताराम 🙏🌺श्री नारायणदास भक्तमाली जी( मामाजी महाराज) का अद्भुत जीवन
गीता वाटिका में पूज्य श्री राधा बाबा जयंतीमहोत्सव पर
प्रतिवर्ष -पूजय श्री मामा जी के वास्तव में कथा होती रही है।
परम प्रिय पद –
ए पहुना अब मिथिले में रहु ना
जउने सुख बा ससुरारी में, तउने सुखवा कहूं ना
रोज सवेरे उबटन मलके इत्तर से नहवाइब ।
एक महीना के भीतर करिया से गोर बनाइब ।।
झूठ कहत ना बानी तनिको, मौका एगो देहुना ।।
नित नवीन मन भावन व्यंजन परससब कंचन थारी ।
स्वाद भूख बढ़ि जाई सुन, सारी सरहज की गारी ।।
बार-बार हम करब चिरौरी, औरी कुछ ही लेहू ना ।।
🌹श्री नारायणदास जी का जन्म बक्सर जिले के अंतर्गत बक्सर प्रखंड के पाण्डेय पट्टी ग्राम में एक चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार मे सितम्बर 1933 ई. में हुआ था,
इनके पिताजी का नाम मधुसुधन चतुर्वेदी था, जो कर्मकांड और ज्योतिष में पारंगत थे,
इनकी माताजी का नाम श्रीमती रामा देवी था
मामाजी महाराज के माता पिता ने इनका शुभ नाम “श्रीमन्ननारायण चतुर्वेदी” रखा था।
जो प्यार से “नारायण” जी भी कह कर पुकारा करते थे।
🌹मामाजी महाराज की प्रारंभिक शिक्षा बक्सर से ही संपन्न हुई तथा उच्च शिक्षा आरा तथा रांची से वाणिज्य विभाग से स्नातक की शिक्षा संपन्न हुई।
बचपन से ही भगवद् गीता के प्रति झुकाव था, तथा प्रभु श्री राम में अनन्य भक्ति थी।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और 1952 ई. में मामाजी महाराज ने किसी शासकीय सेवा में पदाधिकारी के तौर पर नियुक्ति हुई।,
🌹शासकीय पद पर तैनात रहने के दौरान आरा में पहली बार “महर्षि खाकी बाबा सरकार” के किसी कार्यक्रम में दर्शन का सौभाग्य मिला,
दर्शन के उपरान्त मामाजी महाराज, खाकी बाबा से इतने प्रभावित हुए की 1955 ई. में ही शासकीय पदाधिकारी की सेवा त्याग कर तथा पद से इस्तीफा देकर “श्री खाकी बाबा सरकार” से दीक्षा लेकर उनका शिष्य बन गए, तथा उनके साथ रहने लगे।
🌹“श्री फलाहारी बाबा” ने प्रसन्न होकर मामाजी महाराज को “श्री नारायण दास” की उपाधि से विभूषित किया।
युगल सरकार की नित्य लीला स्थली श्रीधाम वृन्दावन में मामाजी ने साधना करने हुए श्रीधाम वृन्दावन में निवास करने लगे।
वही साधना करते हुए सुदामाकुटीर में इन्हें भक्तमाल के रसज्ञ, मर्मज्ञ, “पं. श्री जगनाथप्रसाद भक्तमाल” जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ।
जिनसे इन्होंने संत शिरोमणि “नाभादास” जी द्वारा रचित भक्तमाल का अध्ययन किया।
संत सेवा तथा संतो के आशीर्वाद से भागवत कथा भी कहने लगे, तथा सरस कथा व्यास हुए।
🌹युगल सरकार के प्रति भक्तिभाव तथा जगजननी माँ सीताजी जनकपुर की उपासना से भक्ति रस में आकंठ डूब गए,
तथा कथा के माध्यम से भक्ति के मधुर रस का वितरण करने लगे।
मिथिलांचल का होने के नाते श्री सीता माँ को वो
इस भक्ति भाव में कब बहन मानने लगे कुछ पता नहीं चला।
सीताजी को अपनी बहन मानने के नाते प्रभु श्री राम को अपना बहनोई मानने लगे।
इसी रिश्ते के कारण आगे चलकर “मामाजी” महाराज के नाम से विश्वविख्यात हुए।
मामाजी महाराज ने अनेकों नाटकों, पुस्तकों, दोहों, कविताओं की रचना की।
🌹श्री सिय पिय मिलन महामहोत्सव का उत्सव हर वर्ष बहुत उल्लास से होता है
🌹भक्तमाल रसज्ञ, मर्मज्ञ “पं. श्री जगरन्नाथप्रसाद जी भक्तमाली” की प्रथम पुण्यतिथि पर आयोजित “प्रिया प्रीतम मिलन महोत्सव” में पधारे जगतगुरु “श्री निम्बकाचार्य जी महाराज” ने उन्हें श्री जगनाथप्रसाद भक्तमाली जी का उत्तराधिकारी घोषित कर भक्तमाली कि उपाधि से विभूषित किया
🌹इस तरह से मामाजी महाराज का पूरा नाम ” श्री नारायण दास भक्तमाली जी” हुआ।
ऐसी अद्भुत भाव, अभिव्यक्ति के स्वामी होते हुए भी मामाजी महाराज अत्यंत विनयशील, निराभिमानी एवं सरल थे,
अतिथि सत्कार उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही थी।
जो मानव एक बार परम पूज्य मामाजी महाराज का सान्निध्य का सुख पा लेता था,
वह सदा के लिए उनका हो जाता था।
सादर जय सियाराम 🙏,जय गोमाता जय गोपाल 🙏

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