Press "Enter" to skip to content

घूँघट और दर्शन

🌸 घूँघट और दर्शन 🌸
वे बहुत दिनों से देख रहे थे।
जब कभी “उनकी” चर्चा चलती,
तो उसके अधरों पर
लज्जा और गर्व से भरी
एक मधुर मुस्कान अठखेलियाँ करने लगती।


वह मुख झुका लेती—
कि हृदय की बात
हृदय में ही गुप्त बनी रहे।
जगत से भले ही
कुछ समय तक
उस बात को छुपा लिया जाए,
किन्तु उनसे…
उनसे क्या कभी कुछ छुप सकता है?


एक दिन सद्गुरुदेव ने
बुला ही लिया।
मुस्कराते हुए,
प्रश्नवाचक दृष्टि से
मानो स्वीकारोक्ति चाही हो।
मैंने भी मुस्कराकर
मौन के माध्यम से ही
गोपन रहस्य प्रकट कर दिया।
वे पास बुलाकर
कान में बोले—


“आज से उनकी हुई…
किन्तु अब जगत से पर्दा करना होगा।”
मूढ़-मति ने
मस्तक हिलाकर हामी भर दी।
सबसे व्यवहार कम हो गया।
अब किसी को देखने की चाह ही न रही,
सो सदा घूँघट रहने लगा।
यहाँ तक कि
एकांत में भी
घूँघट नहीं उतारती—
कहीं अकस्मात कोई देख न ले।
घूँघट के भीतर
हँसी भी छुपी हुई,
और अश्रु भी मौन।


सद्गुरुदेव ने कहा था—
“उनकी हुई।”
तो फिर क्यों न मिले
प्राण–प्रियतम?
एक दिन
अपनी पीड़ा
सद्गुरुदेव के चरणों में रख दी।


वे मुस्करा दिए।
मस्तक पर
परम स्नेहमयी चपत लगाकर बोले—
“अरी बाबरी!
जगत से पर्दे की बात कही थी…
उनसे नहीं!”
“घूँघट के पट खोल—
तोहे पिया मिलेंगे!”
🌸
श्री कुंजबिहारी !
श्री हरिदास !!
🌸
✨ भाव-सार
भक्ति में गोपन आवश्यक है,
पर भगवान से नहीं।
जहाँ अहं का घूँघट हटता है,
वहीं प्रियतम का दर्शन होता है।

Comments are closed.

You cannot copy content of this page