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भक्ति की महिमा

नाट्य शीर्षक: “भक्ति की महिमा”

पात्र:

  • गुरुजी (वृद्ध, शांत और करुणामयी स्वर)
  • शिष्य (जिज्ञासु, युवा)
  • ज्ञान (गंभीर और तार्किक स्वर)
  • वैराग्य (निरासक्त, संयमी)
  • भक्ति माता (ममतामयी, दिव्य आभा वाली)

दृश्य 1:
(आश्रम का शांत वातावरण। वृक्ष के नीचे गुरुजी ध्यानमग्न हैं। शिष्य उनके पास आकर प्रणाम करता है।)

शिष्य:
(विनम्रता से)
गुरुदेव! आपने कहा था कि कलियुग में मोक्ष का सरल उपाय है… कृपया विस्तार से बताइए।

गुरुजी:
(मुस्कुराकर)
वत्स! उस उपाय का नाम है — भक्ति।
भक्ति एकमात्र ऐसा मार्ग है जो न तो यज्ञ माँगता है, न कठिन तप। यह तो केवल प्रेम माँगता है… शुद्ध प्रेम।

(मंच पर दिव्य प्रकाश फैलता है, और ‘भक्ति माता’ का प्रवेश होता है — श्वेत वस्त्रों में, हाथ में तुलसी की माला)

भक्ति माता:
(कोमल स्वर में)
मुझे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं। मैं स्वयं में पूर्ण हूँ। पर मेरे पुत्र — ज्ञान और वैराग्य — तभी जाग्रत होते हैं जब मैं उनके हृदय में स्थान लेती हूँ।

(मंच पर ‘ज्ञान’ और ‘वैराग्य’ का प्रवेश होता है)

ज्ञान:
(गंभीर स्वर में)
मैं तो शुष्क विवेचन हूँ। यदि भक्ति न हो तो मेरा ज्ञान भी अहंकार बन जाता है।

वैराग्य:
(शांत भाव से)
और मैं, बिना भक्ति के, केवल निराशा और पलायन बन जाता हूँ।

शिष्य:
(आश्चर्य से)
तो क्या भक्ति आप दोनों की जननी हैं?

ज्ञान और वैराग्य (एक स्वर में):
हाँ, हम भक्ति माता के पुत्र हैं।

भक्ति माता:
(शिष्य की ओर देखकर)
वत्स! इस कलियुग में मेरे बिना कोई भी साधना फलवती नहीं हो सकती।
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन — ये सभी भक्ति के अंग हैं। जो भी सच्चे मन से भगवान का नाम जपता है, वह मुझे प्राप्त करता है।

गुरुजी:
(भावविभोर होकर)
इसलिए श्रीमद्भागवत में कहा गया है —
“स तु भक्त्या भजेत्येव नैमेर्मण्येन चापरे”
केवल भक्ति से ही भगवान की प्राप्ति संभव है।

शिष्य:
(हर्षित होकर)
गुरुदेव! आज समझ में आया कि भक्ति ही सच्चा मार्ग है। यह सहज भी है, और सबसे ऊँचा भी।

भक्ति माता (वरद मुद्रा में):
जो मुझे अपनाता है, मैं उसके जीवन में प्रेम, शांति और भगवान की अनुभूति भर देती हूँ।

(दीप प्रकाश के साथ मंच धीरे-धीरे अंधकारमय होता है — भक्ति माता अंतर्धान हो जाती हैं।)

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