Press "Enter" to skip to content

भक्ति की महिमा – एक आध्यात्मिक नाट्य रूप

भक्ति मार्ग में न कोई जटिल यज्ञ की आवश्यकता होती है, न तीव्र तपस्या की, न ही कठिन साधना की। केवल प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण, कीर्तन, श्रवण, वंदन, अर्चन आदि करना ही इस मार्ग का सार है। यही कारण है कि संत, महात्मा, और शास्त्र सभी कलियुग के लिए भक्ति मार्ग को ही सर्वोत्तम बताते हैं।

भक्ति न तो जाति देखती है, न ही वर्ण, न आयु, न ही योग्यता। एक बालक प्रह्लाद से लेकर एक पशु गजेंद्र तक, एक वेश्या से लेकर एक शिकारी तक, जिसने भी भक्ति के मार्ग को अपनाया, वह परम पद को प्राप्त कर सका।

भक्ति के विषय में श्रीनारदजी कहते हैं—
“स तु भक्त्या भजेत्येव नैमेर्मण्येन चापरे”
अर्थात, भगवान को केवल भक्ति से ही भजना चाहिए, अन्य किसी भी साधन से नहीं।

जिस प्रकार जल में मछली स्वतः ही तैरती है, उसी प्रकार भक्ति में जो प्रवाह है, वह साधक को सहज ही भगवान के चरणों तक पहुँचा देता है। इसलिए भक्ति को स्वयं भगवान भी स्वीकार करते हैं और उसमें स्वयं को वशीभूत मानते हैं।

जैसा कि गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—

“बिनु हरि भजन न भव तरे, संसय सुनहु मुनिनाथ।
हरि बिमुख नर की गति नहीं, ज्यों बूंद गिरे बिनु माथ॥”

अतः इस कलियुग में यदि कोई उपाय शेष है जो मनुष्य को भवसागर से पार करा सके, तो वह केवल और केवल भक्ति है—प्रेममयी, सरल, और सर्वोत्तम भक्ति।

राधे राधे।

Comments are closed.

You cannot copy content of this page