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श्रीजाह्नवा माता: श्रीनित्यानंद प्रभु की आह्लादिनी शक्ति


श्रीजाह्नवा माता: श्रीनित्यानंद प्रभु की आह्लादिनी शक्ति

शुभ आविर्भाव तिथि की मंगलमयी वंदना!

जब श्रीगौरांग महाप्रभु ने अपने पावन अवतरण के द्वारा भक्तिरस की गंगा प्रवाहित की, तब उनके परम सहयोगी और सर्वविलासमयी श्रीनित्यानंद प्रभु ने अपने साथ दो दिव्य शक्तियों को इस पृथ्वी पर प्रकट किया—श्रीमती वसुधा देवी और श्रीमती जाह्नवा देवी। ये दोनों श्रीकृष्ण लीला की रत्नस्वरूपा थीं—वारुणी और रेवती।

रेवती जी, जो द्वापर युग में बलराम जी की परमपत्नी थीं, कलियुग में श्रीगौर लीला में श्रीमती जाह्नवा देवी के रूप में प्रकट हुईं। इनका जन्म बंगाल के अंबिका नगर में श्रीसूर्यदास सरखेल और श्रीमती भद्रवती के पावन कुल में हुआ। श्रीसूर्यदास वही महर्षि ककुद्मी थे जिन्होंने सतयुग में रेवती का कन्यादान स्वयं बलराम जी से किया था। अतः इस अवतरण में भी वे पुनः अपनी पुत्री को श्रीनित्यानंद प्रभु को समर्पित कर दिव्य लीला में सहभागी बने।

श्रीमती जाह्नवा माता जी, न केवल नित्यानंद प्रभु की सहधर्मिणी थीं, अपितु वे सम्पूर्ण गौर-परिवार की शरणदात्री, भक्तों की पालनकर्त्री, और अखंड भक्ति-धारा की स्रोतस्विनी थीं। उनके चरणों की सेवा से ही जीव को श्रीनित्यानंद प्रभु की सेवा और श्रीगौरांग महाप्रभु की प्रेममयी कृपा प्राप्त होती है।

गौर-भक्तों के जीवन में श्रीजाह्नवा माता केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं, अपितु एक जीवित शक्ति हैं—जो आज भी हर भक्त के जीवन में भक्ति की ज्योति जलाती हैं, मार्गदर्शन करती हैं और श्रीराधा-कृष्ण की निष्कलुष प्रेमसेवा का वरदान देती हैं।


आध्यात्मिक सीख:

“जिन्हें जाह्नवा माता ने अपनाया, उन्हें नित्यानंद ने अपनाया, और जिन पर नित्यानंद प्रसन्न हुए, उन पर श्रीगौरांग महाप्रभु का प्रेम अनन्त काल तक बरसता है।”


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