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श्रीराधा रानी की, हम जीवों पर निरन्तर बरसती हुई कृपा

श्रीराधा रानी की, हम जीवों पर निरन्तर बरसती हुई कृपा का, हम जीवों को एक बहुत बहुत दुर्लभ उपहार….परम पूज्य श्रीभाईजी का “”राधा माधव चिन्तन।

🌹तीनों लोकों में पृथ्वी सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है। उसमें भी जम्बूद्वीप सब द्वीपों में श्रेष्ठ है। जम्बूद्वीप में भी भारतवर्ष और भारतवर्ष में भी मथुरापुरी श्रेष्ठ है। मथुरा में भी वृन्दावन, वृन्दावन में भी गोपियों का समुदाय, उस समुदाय में भी श्रीराधा की सखियों का वर्ग तथा उसमें भी स्वयं श्रीराधिकाजी सर्वश्रेष्ठ हैं।

🌹श्रीनारद द्वारा राधा-दर्शन का स्तवन 🌹

🌹इन अखिल-जगदीश्वरी, रासेश्वरी, नित्यनिकुञ्जेश्वरी, नित्य-श्रीकृष्णवल्लभा, श्रीकृष्णात्मा, श्रीकृष्णप्राणस्वरूपा, श्रीकृष्णाराधनतत्परा, श्रीकृष्णाराध्या श्रीराधाजी का मंगलमय दर्शन प्राप्त करने के लिये देवर्षि नारद श्रीवृषभानुपुर पहुँचे और वहाँ वृषभानु के साथ प्रसूति घर में प्रवेश करके पृथ्वी पर सोयी हुई अखिल-जगज्जननी अखिल-सौन्दर्य-प्रतिमा नवजात कन्या को देखकर वे मुग्ध हो गये और एकमात्र रसायन रूप परमानन्द सिन्धु में अवगाहन करने लगे।

🌹तदनन्तर उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठा लिया और गोप प्रवर भानु को कार्यान्तर से कहीं अन्यत्र भेजकर वे उन दिव्य रूप धारिणी बालिका की स्तुति करने लगे।
नारद बोले- ‘देवि! तुम महायोगमयी हो, माया की अधीश्वरी हो। तुम्हारा तेजःपुञ्ज महान है।

🌹तुम्हारे दिव्य अंग मन को अत्यन्त मोहित करने वाले हैं। तुम महान् माधर्यु की वर्षा करने वाली हो। तुम्हारा हृदय अत्यन्त अद्भुत रसानुभूतिजनित दिव्य आनन्द से परिप्लुत तथा शिथिल रहता है। मेरा कोई महान सौभाग्य था, जिससे तुम मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट हुई हो। देवि! तुम्हारी दृष्टि सदा आन्तरिक दिव्य सुख में निमग्न दिखायी देती है। तुम भीतर-ही-भीतर किसी अगाध आनन्द से परितृप्त जान पड़ती हो।

🌹तुम्हारा यह प्रसन्न, मधुर एवं शान्त मुखमण्डल तुम्हारे अन्तःकरण में किसी परम आश्चर्यमय आनन्द के उद्रेक की सूचना दे रहा है। सृष्टि, स्थिति और संहार तुम्हारे ही स्वरूप हैं; तुम्हीं इनका अधिष्ठान हो। तुम्हीं विशुद्ध सत्त्वमयी हो तथा तुम्हीं पराविद्यारूपिणी शक्ति हो। तुम्हारा वैभव आश्चर्यमय है। ब्रह्मा और रुद्र आदि के लिये भी तुम्हारे तत्त्व का बोध होना कठिन है। बड़े-बडे योगीश्वरों के ध्यान में भी तुम कभी नहीं आतीं। तुम्हीं सबकी अधीश्वरी हो।

🌹इच्छा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति- ये सब तुम्हारे अंशमात्र हैं। ऐसी ही मेरी धारणा है-

🌹मेरी बुद्धि में यही बात आती है। माया से बालक रूप धारण करने वाले परमेश्वर महाविष्णु की जो मायामयी अचिन्त्य विभूतियाँ हैं, वे सब तुम्हारी अंशभूता हैं। तुम आनन्दरूपिणी शक्ति और सबकी ईश्वरी हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। निश्चय ही भगवान श्रीकृष्ण वृन्दावन में तुम्हारे ही साथ नित्य लीला करते हैं। कुमारावस्था में भी तुम अपने रूप से विश्व को मोहित करने की शक्ति रखती हो। किंतु तुम्हारा जो स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को परम प्रिय है, आज मैं उसी का दर्शन करना चाहता हूँ। महेश्वरि! मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ, चरणों में पड़ा हूँ। मुझ पर दया करके इस समय अपना वह मनोहर रूप प्रकट करो, जिसे देखकर नन्दनन्दन श्रीकृष्ण भी मोहित हो जायँगे।’

🌹यों कहकर देवर्षि नारदजी श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए इस प्रकार उनके गुणों का गान करने लगे- ‘भक्तों के चित्त चुराने वाले श्रीकृष्ण! तुम्हारी जय हो।

🌹वृन्दावन के प्रेमी गोविन्द! तुम्हारी जय हो। बाँकी भौंहों के कारण अत्यन्त सुन्दर, वंशी बजाने में व्यग्र, मोर पंख का मुकुट धारण करने वाले गोपीमोहन! तुम्हारी जय हो, जय हो। अपने श्रीअंगों में कुंकुम लगाकर रत्नमय आभूषण धारण करने वाले नन्दनन्दन! तुम्हारी जय हो, जय हो। अपने किशोर स्वरूप से प्रेमीजनों का मन मोहने वाले जगदीश्वर! वह दिन कब आयेगा, जब मैं तुम्हारी ही कृपा से तुम्हें अभिनव तरुणावस्था के अनुरूप अंग-अंग में मनोहर शोभा धारण करने वाली इस दिव्यरूपा बालिका के साथ देखूँगा।’

🌹नारदजी जब इस प्रकार कीर्तन कर रहे थे, उसी समय वह नन्हीं-सी बालिका क्षणभर में अत्यन्त मनोहर दिव्यरूप धारण करके पुनः उनके सामने प्रकट हो गयी। वह रूप चौदह वर्ष की अवस्था के अनुरूप और सौन्दर्य की चरम सीमा को पहुँचा हुआ था। तत्काल ही उसी के समान अवस्था वाली दूसरी अनेकों व्रज-बालाएँ भी दिव्य वस्त्र, आभूषण और मालाओं से सुसज्जित हो वहाँ प्रकट हो गयीं तथा भानु कुमारी को सब ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं।

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