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विरह की परमावस्था – श्रीमन्महाप्रभु का भाव

“युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे।।”

(श्री शिक्षाष्टकम् – ७)

श्रीगौरांग महाप्रभु का यह विलक्षण भावोद्गार हृदय को स्पर्श कर जाता है। महाप्रभु कहते हैं—”हे गोविन्द! आपके विरह में मेरे लिए एक क्षण युग के समान प्रतीत हो रहा है। नेत्रों से निरंतर अश्रु-प्रवाह हो रहा है, मानो मूसलाधार वर्षा हो, और समस्त जगत मुझे एक शून्य जैसा दिख रहा है।”

यह विरह, यह अधीरता, यह तड़प – यही तो प्रेम की पराकाष्ठा है। प्रेम के दो रूप होते हैं: मिलन और विरह। यद्यपि देखने में विरह दुःखप्रद जान पड़ता है, किंतु उसका मूलस्वरूप रसस्वरूप है। यही कारण है कि विरह को भी रस कहा गया है।

मिलन में जहाँ प्रेमी केवल एक कृष्ण को पाता है, वहीं विरह में उसे सम्पूर्ण त्रिभुवन कृष्णमय प्रतीत होता है। यह विरह केवल संसार का दुःख नहीं है, यह परमानंद की वह स्थिति है जहाँ आत्मा अपने परम इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण और अधीनता का अनुभव करती है।

मनुष्य का मन जब सांसारिक विषयों से विरक्त होकर रागानुगा भक्ति की ओर प्रवृत्त होता है, तो उसे ब्रजभाव की साधना में इष्ट की अनुपस्थिति का बोध होने लगता है। किंतु हम जैसे तुच्छ जीव, जिनके हृदय में नित्य सांसारिक अभाव—धन, मान, प्रतिष्ठा आदि—का बोध होता है, वहाँ इष्ट के अभाव का अनुभव नहीं होता। यह हमारी दुर्दशा का प्रतीक है।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने हृदय की इस शुष्कता पर लज्जित हों, और अपने चित्त में धिक्कार एवं अनुताप का संचार करें। “हे नाथ! आपके विरह में मेरी आँखें कभी तो तरसें, कभी तो रुदन करें, कभी तो ह्रदय में आपकी याद से एक टीस उठे!”—यही भावना, यही पीड़ा साधक को भक्त बनाती है।

“कृष्ण विरह” कोई सामान्य वियोग नहीं है, यह भक्ति की सर्वश्रेष्ठ अवस्था है, जिसमें आत्मा को अपने मूलस्वरूप का बोध होता है। यह वियोग ही वह दीप है जो आत्मा को परमेश्वर तक पहुँचाने की राह रोशन करता है।

विरह का सौंदर्य – चेतना का परम शिखर

जिस क्षण आत्मा को यह अनुभूति हो कि “मेरे प्रिय प्रभु मुझसे दूर हैं,” उसी क्षण से प्रेम का अंकुर फूटता है। श्रीमन्महाप्रभु की यही विरह भरी पुकार यह सिखाती है कि ईश्वर की अनुपस्थिति का अनुभव ही ईश्वर की उपस्थिति की शुरुआत है।

जिस प्रकार सूर्य के अस्त होने पर ही चंद्रमा की शीतलता का अनुभव होता है, उसी प्रकार प्रभु के विरह में ही प्रेम की शीतलता और विरह का अमृत मिलता है।

“विरह वह अग्नि है, जिसमें प्रेम की शुद्धता तपकर प्रकट होती है।”

जहाँ मिलन में हर्ष होता है, वहीं विरह में हृदय की परतें खुलती हैं। यह विरह कोई सामान्य वियोग नहीं, अपितु ब्रह्मानंद की अनुभूति है। श्री राधा जी का हर क्षण यही विरह है – हर श्वास में श्रीकृष्ण की तलाश। और यही विरह भक्ति का प्राण है।

एक मार्मिक दोहा:

विरह अग्नि में जल रहा, प्रेमी का यह तन।
कृष्ण बिना सब सूना लगे, यह जीवन भी मरण।

हमारे जैसे साधक जब श्रीमन्महाप्रभु के इन वचनों को पढ़ते हैं, तो हमें अपने हृदय में झांककर देखना चाहिए—क्या हमारे भीतर ऐसा कोई विरह भाव है? क्या प्रभु की अनुपस्थिति में हमारी आँखें नम होती हैं? क्या चित्त में कभी उस प्रियतम की याद से कम्पन होता है?

यदि नहीं, तो यह हमारा आत्मिक संकट है।

इसलिए भक्ति का आरंभ वहीं से होता है, जहाँ आत्मा को अपने इष्ट के अभाव का बोध होता है। यह बोध ही उस मार्ग की पहली सीढ़ी है, जो हमें रस के सागर की ओर ले जाती है।


भक्ति की साधना का मूलमंत्र:

“विरह में रुदन ही साधक का सबसे बड़ा तप है।”

राधे राधे।

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