श्रीमन्महाप्रभु के श्लोक “नयनं गलदश्रुधारया…” के माध्यम से जानिए उत्कंठा और भावयुक्त भजन का महत्व। कैसे एक साधक की व्याकुलता ही उसे भगवान के निकट पहुंचाती है। यह लेख बताता है कि बिना उत्कंठा के भक्ति का स्वाद संभव नहीं।
नयनं गलदश्रुधारया… — उत्कंठा का परम रहस्य
श्रीमद्गौड़ीय परंपरा में श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव द्वारा भावपूर्ण रूप में उद्घोषित यह श्लोक —
“नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥”
— केवल शब्दों की रचना नहीं, अपितु हृदय की परम व्याकुलता की अभिव्यक्ति है।
महाप्रभु कहते हैं —
“हे प्रभु! आपके पावन नाम का उच्चारण करते समय मेरे नेत्रों से अश्रुधार कब बहने लगेगी? मेरा कंठ कब भावविभोर होकर गदगद हो उठेगा? और कब मेरी देह पुलकित होकर आपके नाम की महिमा का साक्षात अनुभव करेगी?”

यह कोई सामान्य प्रार्थना नहीं, बल्कि उस आत्मा की पुकार है, जो भगवान के प्रेम में पूर्ण रूप से तल्लीन होना चाहती है। यह उत्कंठा वह लौ है, जो आत्मा को ईश्वर के साक्षात्कार की ओर जलाती है।
जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति गर्मी में जल की एक बूँद के लिए तरसता है, और जब उसे जल प्राप्त होता है, तो उसे जीवनदायिनी अमृत के समान अनुभव होता है; किंतु जिसे प्यास ही नहीं, उसके लिए जल का कोई विशेष मूल्य नहीं। उसी प्रकार, जब तक साधक के हृदय में भक्ति की तीव्र प्यास — अर्थात उत्कंठा — नहीं होती, तब तक वह ईश्वर नाम का वास्तविक स्वाद नहीं ले सकता।
साधन से लेकर सिद्धि तक, सभी स्तरों पर यह उत्कंठा अत्यंत आवश्यक है। यहां तक कि नित्यसिद्ध महात्मा भी यदि प्रेम में डूबकर प्रभु की एक झलक पाने को व्याकुल नहीं होते, तो उन्हें भी भगवत्साक्षात्कार दुर्लभ हो जाता है।
उत्कंठा ही वह जीवंतता है, जो भजन को निष्क्रिय क्रिया से जीवित भावों की लहर में परिवर्तित करती है।
जब यह उत्कंठा साधक के भीतर जन्म लेती है, तभी उसका भजन अनुरागमय होता है और तभी प्रभु नाम की महिमा उसके रोम-रोम में उतरती है।
दोहा:
प्रेम बिना जो नाम ले, वह केवल आवाज।
उत्कंठा मिलि भाव से, जागे प्रभु की ताज॥
अतः, साधक को चाहिए कि वह नामस्मरण के साथ अपने हृदय में उस चिरवांछित दर्शन की तीव्र प्यास जगाए। जब भजन केवल अभ्यास नहीं, बल्कि हृदय की भूख बन जाए — तब यह श्लोक केवल कविता नहीं, बल्कि साक्षात अनुभव बन जाएगा।
राधे राधे।
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