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भगवन्नाम की महिमा को स्कन्दपुराण में

भगवन्नाम महिमा

“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च |
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ||”

हे देवर्षि! मैं न तो वैकुण्ठ में निवास करता हूँ और न ही योगियों के हृदय में। मैं तो वहीं निवास करता हूँ जहाँ मेरे भक्त अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं और मेरे मधुर नामों का संकीर्तन करते हैं।

भगवन्नाम की महिमा को स्कन्दपुराण में और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

“यन्नाऽस्ति कर्मजं लोके वाग्जं मानसमेव वा |
यन्न क्षपयते पापं कलौ गोविन्दकीर्तनम् ||”

मन, वाणी और कर्म से उत्पन्न समस्त पापों का नाश केवल गोविंद नाम संकीर्तन से संभव है।

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—

“कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मृति नित्यशः |
जलं भित्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ||”

जो भक्त नित्यप्रति कृष्ण नाम का संकीर्तन करते हैं, मैं उन्हें नरक से उसी प्रकार बाहर निकाल लेता हूँ जैसे जल का भेदन कर कमल बाहर निकल आता है।

इसलिए हर श्रद्धालु को चाहिए कि समय रहते अपने विवेक को जाग्रत करें, भगवन्नाम की महिमा को पहचानें और इस अमृत को अपने जीवन में घोलकर उसका रसास्वादन करें। केवल इसी से भवबंधन से मुक्ति संभव है।

॥ जय गोविंद! जय गुरुदेव! ॥

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