यह प्रेरणादायक कथा, श्री मधुसूदन सरस्वती के जीवन में अद्वैत वेदांत से गूढ़ भक्ति मार्ग की ओर उनके परिवर्तन को दर्शाती है।
श्री मधुसूदन सरस्वती की ब्रजभक्ति
श्री मधुसूदन सरस्वती, जो एक महान अद्वैत वेदांती और शंकराचार्य पद के अधिकारी थे, वे ब्रज की रज में लोटने वाले एक गोपीभाव भक्त कैसे बने, यह कथा अद्वितीय है। वे केवल एक ही घर से मधुकरी मांगकर रहते थे और अगर वह नहीं मिलती, तो बिना खाए ही रहते।
एक दिन, ब्रज की एक गोपी के घर गए। गोपी चूल्हे पर रोटियाँ बना रही थी और उसकी गोदी में उसका शिशु माखन रोटी खा रहा था। स्वामी जी ने जब गोपी को देखा तो उसने बालक को गोदी से उतारकर स्वामी जी के पात्र में रोटी डाल दी। परंतु, स्वामी जी ने देखा कि उसकी साड़ी पर बालक का मल लगा हुआ था। इस दुविधा में वे विचार करने लगे कि इस रोटी को न तो लौटा सकते हैं और न ही ग्रहण कर सकते हैं।
आँखें बंद कर उन्होंने गहरे चिंतन में प्रवेश किया, और जब आँखें खोलीं तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण स्वयं उस गोपी के आँगन में बैठे बालक के मुँह से माखन रोटी छीनकर खा रहे हैं। स्वामी जी को तब इस बात का अहसास हुआ कि ब्रज की गोपियाँ और ब्रजवासियों का भाव सामान्य नहीं है।
उनका सारा अद्वैत ज्ञान क्षीण हो गया और उन्होंने उसी क्षण ब्रज की रज में लोटने का निर्णय किया। वे प्रण कर चुके थे कि अब काशी लौटकर नहीं जाएँगे।
छह महीने तक, स्वामी जी यमुना स्नान करते, गोपियों की चरण रज को मस्तक पर लगाते और स्वयं को गोपियों की दासी मानते हुए ब्रज में पागलों की तरह विचरण करते रहे।
जब उनके शिष्य उन्हें ढूँढते हुए वृंदावन पहुँचे, तो उन्होंने स्वामी जी से कहा, “आप जैसे वेदांत के ज्ञाता महापुरुष ऐसे पागलों की तरह क्यों रज में लोट रहे हैं? आपका तत्वज्ञान कहाँ चला गया?”
तब स्वामी जी ने एक भावपूर्ण श्लोक उच्चारित किया:
वंशी विभूषित करात् नवनीरद आभात्
पीताम्बरात् अरुणबिंबफल अधरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुंदर मुखात् अरविंद नेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने।।
अर्थात: जिनके करकमलों में बाँसुरी सुशोभित है, जिनके श्यामल शरीर की आभा नवनीरद के समान है, जिन्होंने पीताम्बर धारण किया है, जिनके अधर बिंबफलों के समान लाल हैं, जिनका मुख पूर्ण चंद्र के समान मनोहर है, जिनकी आँखें कमल के समान हैं—उन श्रीकृष्ण से बढ़कर कोई और परम तत्व हो सकता है, यह मैं नहीं जानता।
शिष्यों ने कहा, “शंकराचार्य पद आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।”
परंतु, स्वामी जी ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “अब मुझे इस पद से क्या लेना-देना? भगवान की कृपा से अब मैं गोपियों की पद-दासी बन चुका हूँ। अब मैं ब्रज छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”
शिक्षा:
यह कथा इस बात का सजीव उदाहरण है कि किस प्रकार भक्ति का मार्ग तत्वज्ञान से परे है। जब भगवान की कृपा होती है, तब ज्ञान भी विनम्र होकर भक्ति में विलीन हो जाता है। श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का नि:स्वार्थ प्रेम और समर्पण ही सबसे ऊँचा आदर्श है।
दोहा:
प्रेम ज्ञान को हरा देता है, और भगवान कृष्ण की ध्यान से सबकुछ ज्ञात होता है।
अर्थात: ज्ञान प्रेम के समक्ष हार जाता है, और श्रीकृष्ण के साथ गोपियों का अनन्य प्रेम सभी तत्वों को पीछे छोड़ देता है। जिसने श्रीकृष्ण को हृदय से ध्याया, उसे हर युग में स्मरण किया जाता है।

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