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श्री अलारनाथ जी मंदिर – श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमद्रवित शरीरचिह्नों का दुर्लभ दर्शन

श्री अलारनाथ जी मंदिर, ओडिशा के जगन्नाथ पुरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित है। यह प्राचीन मंदिर श्री हरि विष्णु को समर्पित है, जिन्हें यहाँ श्री अलारनाथ के रूप में पूजित किया जाता है। यह स्थल विशेषतः अनवसर काल में विशेष महत्त्व रखता है—जब स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ गर्भगृह में विश्राम करते हैं और उनके दर्शन भक्तों के लिए संभव नहीं होते।

उसी अवधि में श्री चैतन्य महाप्रभु, जो श्री जगन्नाथजी के परम भक्त थे, अपने प्रिय प्रभु के विरह में व्याकुल होकर अलारनाथ जी मंदिर में पधारते थे। वहाँ वे प्रभु की अनुपस्थिति के कारण प्रेम-वियोग में इतना अधिक द्रवित हो जाते कि अपने अंगों सहित पाषाण भूमि पर लोटते रहते और गहन भक्ति भाव में लीन हो जाते।

इसी प्रेमोन्माद की अवस्था में, जब महाप्रभु भूमि पर पड़े थे, तो वह पाषाण चमत्कारिक रूप से पिघल गया और आज भी उनके संपूर्ण शरीर के चिह्न – चरण, वक्षस्थल, मस्तक एवं बाहुएँ उस काले पाषाण पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। यह दिव्य चिह्न प्रेमद्रवित शिला (Premadaru Shila) के नाम से प्रसिद्ध है और अत्यंत श्रद्धा के साथ इसकी पूजा की जाती है।

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इन चिह्नों का आध्यात्मिक महत्त्व

  • दिव्य प्रेम का प्रतीक: ये चिह्न महाप्रभु के उस अनन्य भक्ति भाव का जीवंत साक्ष्य हैं, जिसने पाषाण को भी पिघला दिया।
  • दुर्लभ दर्शन: ऐसी घटना विश्व में अत्यंत दुर्लभ है। भक्तगण इसे देखकर गहरे भाव-विभोर हो जाते हैं।
  • भक्ति की जागृति: ऐसा माना जाता है कि इन चिह्नों के दर्शन से साधक के हृदय में स्वतः भक्ति की भावना उत्पन्न होती है, जो साधना में सहायता करती है।

अनवसर काल और अलारनाथ जी मंदिर

जब भगवान जगन्नाथ स्नान यात्रा के बाद लगभग 15 दिनों तक अपने गर्भगृह में रहते हैं और दर्शन नहीं देते, तब भक्तगण श्री अलारनाथ जी मंदिर जाकर श्रीहरि के दर्शन करते हैं। यह समय विशेष रूप से गौड़ीय वैष्णवों के लिए अत्यंत भावपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह स्थल है जहाँ उनके प्रिय नायक, श्री चैतन्य महाप्रभु, प्रेम में सराबोर होकर प्रभु के विरह को जीते थे।

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