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श्रील जीव गोस्वामी पाद के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष

🙌🏻 आज श्रील जीव गोस्वामी पाद के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष ::

श्रील जीव गोस्वामी का जन्म पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568(सन् 1511)को बंगाल के रामकेलि ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम वल्लभ था, किन्तु भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने उनको अनुपम नाम दिया था। श्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ (अनुपम) गोस्वामी, ये तीनों भाई नवाब हुसैन शाह के दरबार में उच्च पदासीन थे। बादशाह की सेवाओं के बदले इन लोगों को अच्छा भुगतान होता था, जिसके कारण इनका जीवन अत्यंत सुखमय था। श्री जीव, श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामी के भतीजे थे और श्री रूप गोस्वामी जी से दीक्षा ग्रहण की थी।

आपका बाल्य काल से ही भगवद् अनुराग देखा जाता है । आप बचपन में अपने मित्रों के साथ श्रीकृष्ण पूजा सम्बन्धित खेल छोड़ कर और कोई खेल नहीं खेलते थे। स्वयं कृष्ण-बलराम जी की मूर्ति बना कर उनकी चन्दन, पुष्प, इत्यादि से पूजा करते, उन्हें रत्न-जड़ित सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, अलंकार पहनाते तथा अत्यन्त उल्लासपूर्ण हृदय से बिना पलक झपकाये दर्शन करते तथा साष्टांग प्रणाम करते तो इस प्रकार लगता मानो सोने की मूर्ति धूलि में पड़ी हो । इसके अलावा बहुत प्रकार की मिठाईयाँ श्रीकृष्ण-बलराम को भोग लगाते तथा सभी बालकों के साथ प्रेमानन्द में प्रसाद पाते।

एक रात्रि जब श्रील रूप गोस्वामी सो रहे थे तब ठाकुर श्री राधा दामोदर ने उन्हें स्वप्न में यह आदेश दिया कि तुम अपने शिष्य व मेरे भक्त जीव गोस्वामी के लिए दामोदर स्वरूप को प्रकट करो। तुम मेरे प्रकट विग्रह को मेरी नित्य सेवा हेतु जीव गोस्वामी को दे देना। इस घटना के तुरन्त बाद जब रूप गोस्वामी यमुना स्नान करके आ रहे थे तो उन्हें रास्ते में श्याम रंग का विलक्षण शिलाखण्ड प्राप्त हुआ। तत्पश्चात ठाकुर श्रीराधादामोदर ने उन्हें अपने प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिलाखण्ड को दामोदर स्वरूप प्रदान किया। यह घटना माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1599(सन् 1542) की है। यह दिन वृंदावन में ठाकुर श्री राधा दामोदर प्राकट्य महोत्सव के रूप में अत्यन्त धूमधाम के साथ मनाया जाता है।स्वप्नादेश के अनुसार श्रीरूप गोस्वामी ने दामोदर विग्रह को अपने शिष्य श्रीजीव गोस्वामी को नित्य सेवा हेतु दे दिया। श्रीजीव गोस्वामी ने इस विग्रह को विधिवत् ठाकुर श्रीराधादामोदर मंदिर के सिंहासन पर विराजित कर दिया।

एक बार सम्राट अकबर ने गंगा श्रेष्ठ है या यमुना,इस वितर्क को जानने के लिए जीव गोस्वामी को अपने दरबार में बडे ही सम्मान के साथ बुलाया। इस पर उन्होंने शास्त्रीय प्रमाण देते हुए यह कहा कि गंगा तो भगवान का चरणामृत है और यमुना भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानी। अतएव यमुना, गंगा से श्रेष्ठ है।इस तथ्य को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया।

श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी जी के अप्रकट होने के बाद श्रील जीव गोस्वामी जी को सोत्कल गौड़ मथुरा मण्डल के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सर्वश्रेष्ठ आचार्य पद पर अधिष्ठित (नियुक्त) किया गया था। श्रील जीव गोस्वामी पाद ने गौड़ देश से आये श्रीनिवास, श्रीनरोत्तम तथा दुःखी कृष्णदास को प्रचारक के उपयुक्त देख कर, इन तीनों को यथाक्रम आचार्य, ठाकुर तथा श्यामानन्द नाम (उपाधियाँ) देकर स्वरचित व गोस्वामियों के ग्रन्थों के साथ नाम-प्रेम के प्रचार के लिये गौड़ देश में भेजा था ।

श्री जीव गोस्वामी के द्वारा रचित ग्रंथ “सर्व संवादिनी”, “षट्संदर्भ” एवं “श्री गोपाल चम्पू” आदि विश्व प्रसिद्ध हैं। षट् संदर्भ न केवल गौडीय सम्प्रदाय का अपितु विश्व वैष्णव सम्प्रदायों का अनुपम दर्शन शास्त्र है।

गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय की बहुमूल्य मुकुटमणि श्रील जीव गोस्वामी का अपने जन्म की ही तिथि व माह में पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1653(सन् 1596) को आज ही के दिन वृंदावन में निकुंज गमन हुआ।वे ६५ वर्ष तक श्री वृंदावन में वास करते हुए ८५ वर्ष तक इस धरा धाम पर प्रकट रहे। वृंदावन में श्री राधादामोदर मंदिर के पीछे श्रील जीव गोस्वामी जी का समाधि मन्दिर है। इसके अलावा श्रीराधाकुण्ड के किनारे तथा श्रीललिता-कुण्ड के पास आपकी भजन कुटी आज भी विद्यमान है।

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