प्राचीन कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने व्रज के सभी ग्वालबालों, गौओं और बछड़ों का हरण कर लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से वैसे ही अन्य ग्वालबालों, गौओं और बछड़ों की सृष्टि कर दी, जिससे व्रज के लोगों को इस घटना का पता भी नहीं चला। बाद में, जब ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने अपराध के लिए क्षमा याचना की। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दंडस्वरूप यह वरदान दिया कि तुम कलियुग में नेत्रहीन होकर जन्म लोगे, किंतु यह अंधकार केवल पाँच वर्षों तक रहेगा। इसके पश्चात महात्माओं की कृपा से तुम्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त होगी।
इस दैवीय घटना के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ही कलियुग में श्री नाभादास जी के रूप में प्रकट हुए। अन्य युगों में प्रकट हुए भक्तों के चरित्र पुराणों में उपलब्ध हैं, किंतु विशेष रूप से कलियुग के भक्तों के चरित्र पुराणों में नहीं मिलते थे। इन भक्तों के चरित्रों का विस्तार करने के उद्देश्य से, साथ ही शैव-वैष्णव भेदभाव को समाप्त करने, संत सेवा को प्रोत्साहित करने, भगवान के उत्सवों और व्रतों में निष्ठा को स्थापित करने के लिए श्री नाभादास जी ने भक्तमाल ग्रंथ की रचना की।
भक्तमाल न केवल एक साधारण ग्रंथ है, बल्कि यह संत सेवा, भक्तों के प्रति अपराधों से बचने, और संतों के वेश और निष्ठा को उजागर करने हेतु एक मार्गदर्शक ग्रंथ है। श्री नाभादास जी ने इस ग्रंथ को प्रकट कर भक्तिमार्ग के अनुयायियों को एक ऐसा माध्यम दिया जिससे वे भक्तों और संतों की महिमा का आदरपूर्वक स्मरण कर सकें और भक्ति के मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ सकें।
इस ग्रंथ का महत्व उन संतों और भक्तों की महिमा को उभारने में है, जिन्होंने अपने जीवन में ईश्वर की भक्ति में निष्ठा और समर्पण का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। भक्तमाल का प्राकट्य श्री नाभादास जी की दिव्य दृष्टि और उनके आध्यात्मिक ज्ञान का प्रमाण है, जो आज भी भक्तों के लिए एक अमूल्य धरोहर है।
Be First to Comment