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भवसागर में डूबे जीव की पुकार: श्रीचैतन्य महाप्रभु की अहेतुकी करुणा

श्रीचैतन्य महाप्रभु की करुणामयी प्रार्थना — “अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां…” — जीव की विषम भवसागर से मुक्ति की पुकार है। इस लेख में जानिए, कैसे भगवान के चरणों की शरण ही जीवन का एकमात्र उद्धार है।

भवसागर में डूबे दास की पुकार

अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।
कृपया तव पादपंकज-स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय।।

श्रीचैतन्य महाप्रभु

श्रीचैतन्य महाप्रभु की यह करुणामयी प्रार्थना भक्त के अंतःकरण की गहराई को दर्शाती है। वे कहते हैं —
“हे नन्दनंदन! मैं आपका शाश्वत दास हूँ, किंतु अनादिकालीन मोहवश जन्म-मृत्यु के इस विषम भवसागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे अपने चरणकमलों की धूलि के समान स्थान देकर उद्धार करें।”

यह संसार एक महाविषम समुद्र है — दु:सह, क्लेशदायक और विष के समान जलता हुआ। जीव अनादिकाल से माया के आकर्षण में पड़कर अपने स्वभाविक स्थान — भगवान के चरणों से — दूर हो गया है। यही पतन है।

जिस प्रकार समुद्र के गर्भ में फँसा व्यक्ति कभी ऊपर उठता है, कभी डूबता है — वैसे ही जीव भी इस संसार-सिंधु में काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे षडरिपुओं के बीच फँसकर छटपटाता रहता है। और इस महासागर में पड़े हुए जीव एक-दूसरे के सहायक भी नहीं बन सकते, क्योंकि सभी की स्थिति समान रूप से दुःखमयी और असहाय है।

पद:

ममता रूपी बंधन भारी, मोह मलिन मन की लहर।
काम-क्रोध के मकर जाल में, जीव उलझा बारंबार।।

इस संसार की व्यथा और जड़ता से मुक्ति केवल तब संभव है जब जीव भगवान श्रीहरि के चरणों में पूर्णतः शरणागत हो। उनके चरणों की धूलि ही जीव के लिए वह नौका है, जो उसे इस भवसागर से पार कर सकती है।

महाप्रभु स्वयं, जो स्वयं श्रीकृष्ण ही हैं, हमें यह शिक्षा दे रहे हैं कि — “अपने प्रभु को पुकारो, अपने दास्यभाव को स्वीकारो, और उनके चरणों की शरण में आकर अपने उद्धार की याचना करो।”

दोहा:

छोड़ि सकल आशा तजि, कर श्रीचरण विचार।
तब भवसागर तरै, होय न मन दुःखभार।।

श्रीगोविंद के चरण, भक्ति की शक्ति, और भगवत्कृपा — यही इस दारुण संसार से मुक्ति के एकमात्र साधन हैं। अन्य कोई उपाय नहीं। अतः हे जीव! अब और विलंब मत कर। उस दया के समुद्र श्रीहरि को पुकार, जो चरणों की धूलि भी तुझे पार कर देगी।

राधे राधे।

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