श्री शालिग्राम पूजन से पूर्व अवश्य जानने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य 🙏
(शास्त्रसम्मत, श्रद्धा–संयम एवं मर्यादा सहित)
श्री शालिग्राम भगवान की सेवा साधारण पूजन नहीं, अपितु साक्षात् श्रीहरि की नित्य सन्निधि में जीवन को समर्पित करने का व्रत है। अतः पूजन से पूर्व निम्न बातों का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है—
🌸 श्री शालिग्राम का तत्त्व
१) श्री शालिग्राम साक्षात् भगवान नारायण का निराकार स्वरूप हैं, जैसे नर्मदेश्वर भगवान शिव का स्वरूप माने जाते हैं।
२) काली गण्डकी नदी से प्राप्त शालिग्राम में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, क्योंकि वे स्वयं सिद्ध स्वरूप हैं। अतः पूजन में आह्वान एवं विसर्जन का विधान नहीं है।
🌿 तुलसी की अनिवार्यता
३) शालिग्राम भगवान के साथ तुलसी पत्र का सान्निध्य अनिवार्य है। शयन के समय तुलसी को हटाकर शालिग्राम के पार्श्व में रखें।
४) जो व्यक्ति शालिग्राम से तुलसी पत्र हटाता है, उसे अगले जन्म में पत्नी-वियोग का महान दुःख भोगना पड़ता है।
🛕 शालिग्राम सेवा का महात्म्य
५) जहाँ शालिग्राम भगवान की नित्य सेवा होती है, वह स्थान स्वयं महान तीर्थ बन जाता है।
६) जो भक्त शालिग्राम, तुलसी और शंख को एक साथ रखता है, वह भगवान नारायण को अत्यंत प्रिय होता है।
७) जो प्रतिदिन शालिग्राम का चरणोदक पान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ वास को प्राप्त करता है।
८) चारों वेदों के अध्ययन एवं लाखों वर्षों की तपस्या का जो फल है, वही फल शालिग्राम के नित्य पूजन से प्राप्त हो जाता है।
९) जो प्रतिदिन शालिग्राम भगवान का शुद्ध जल से अभिषेक करता है, उसे समस्त दान एवं पृथ्वी-परिक्रमा का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।
१०) नित्य शालिग्राम सेवा करने वाले को देखकर ब्रह्महत्या जैसे पाप ऐसे भाग जाते हैं, जैसे गरुड़ को देखकर सर्प।
११) शालिग्राम के सेवक के रज (चरण-धूलि) से पृथ्वी तक पवित्र हो जाती है।
🌼 कर्मकाण्ड एवं मोक्ष फल
१२) व्रत, स्नान, प्रतिष्ठा, श्राद्ध एवं देव-पूजन यदि शालिग्राम भगवान की सन्निधि में किए जाएँ, तो सभी तीर्थ-स्नान एवं यज्ञों का फल तुरंत प्राप्त होता है।
१३) मृत्यु के समय शालिग्राम का चरणोदक पान करने से जीव सीधे विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
⚠️ मर्यादा एवं नियम
१४) स्त्री एवं बिना यज्ञोपवीत पुरुष को शालिग्राम का स्पर्श नहीं करना चाहिए।
१५) शालिग्राम भगवान को पवित्र पात्र में रखकर, प्रतिदिन पुरुषसूक्त पाठ के साथ पंचामृत या शुद्ध जल से अभिषेक करना चाहिए।
१६) शालिग्राम पूजन सम संख्या में किया जाता है, किंतु दो शालिग्राम का निषेध है। विषम संख्या में एक शालिग्राम पूजन श्रेष्ठ माना गया है।
१७) शालिग्राम के साथ द्वारावती शिला भी रखी जाती है।
१८) शालिग्राम पर अक्षत अर्पण नहीं किए जाते; उनके स्थान पर श्वेत तिल अर्पित करने का विधान है।
१९) शालिग्राम का अभिषेक सदैव शंख-जल से ही करना चाहिए।
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