संत ब्रजमोहनदास जी महाराज के समीप नियमित रूप से संत श्री रामहरिदास जी आया करते थे। एक दिन उन्होंने जिज्ञासा से पूछा—
“बाबा! बचपन से सुनते आए हैं—
“वृंदावन के वृक्ष को मर्म ना जाने कोय,
डाल-डाल और पात-पात श्री राधे-राधे होय”

क्या यह बात सत्य है? क्या वाकई वृंदावन का हर वृक्ष राधे-राधे गाता है?

महाराज मुस्कराए और बोले, “क्या तुम इसे केवल सुनना चाहते हो या अनुभव भी करना?”
रामहरिदास जी ने हाथ जोड़कर कहा—
“बाबा! अनुभव और दर्शन यदि आपकी कृपा से हो जाए, तो एक साथ तीनों लाभ मिल जाएँ।”
तब ब्रजमोहनदास जी ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की और कहा,
“मन में संकल्प करो और उस सामने खड़े तमाल वृक्ष को देखो।”
जैसे ही रामहरिदास जी ने नेत्र खोले, चकित रह गए—
उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों में “राधे-राधे” लिखा था।
लाखों पत्तों में जहाँ दृष्टि जाती, वहाँ “राधे-राधे” उकेरा हुआ दिखता।
हर पत्ता जब हवा से हिलता, तो उससे “राधे-राधे” की मधुर ध्वनि निकलती थी।
रामहरिदास जी भावविभोर होकर ब्रजमोहनदास जी के चरणों में गिर पड़े।
उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा—
“बाबा! आपकी और राधे रानी की कृपा से मैंने वृंदावन के वृक्ष का मर्म जान लिया।
यह कोई सामान्य वन नहीं, यह तो जीवित भगवतधाम है, जहाँ हर डाल, हर पत्ता, राधा श्याम का गुणगान करता है।

वृज की अनुपम महिमा
व्रज की महिमा को कहे,
को वरने व्रज धाम,
जहाँ बसत हर साँस में,
श्री राधे और श्याम।
व्रज रज जकू मिली गई,
बाकी चाट न शेष,
व्रज की चाहत में रहे,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश।
ब्रज के रस कु जो चखे,
चखे ना दूसर स्वाद,
एक बार राधा कहे,
तो रहे ना कुछ और याद।
जिनके रग-रग में बसे श्री राधे और श्याम,
ऐसे व्रजवासी कु, शत-शत नमन प्रणाम।
वृंदावन—गोलोक का प्रत्यक्ष स्वरूप
संतों को वह वृंदावन दिखता है, जो वास्तव में गोलोक धाम का ही खंड है।
हमारी दृष्टि मायिक है, जो केवल साधारण वृक्ष, पत्थर और धूल देखती है।
लेकिन संत जब कृपा करते हैं, तब विरले भक्तों को दिव्य दृष्टि देते हैं, जिससे वे उस परम व्रजधाम का अनुभव कर पाते हैं—
जहाँ हर पत्ता, हर डाल, राधा रानी के प्रेमरस से सराबोर है।
जय जय श्री राधे!
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