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नरकासुर वध: अहंकार का अंत और करुणा की विजय

नरकासुर वध: अहंकार का अंत और करुणा की विजय


नरकासुर, जिसे भौमासुर के नाम से भी जाना जाता है, प्राग्ज्योतिषपुर का अत्यंत शक्तिशाली राक्षस राजा था। वह भूदेवी—धरती माता—का पुत्र था, किंतु सत्ता, बल और अजेय होने के अहंकार ने उसके विवेक को पूर्णतः नष्ट कर दिया। माता का पुत्र होते हुए भी वह धर्म का नहीं, अधर्म का प्रतीक बन गया।


अहंकार से अंधा होकर नरकासुर ने तीनों लोकों में आतंक फैला दिया। उसने देवताओं के राजा इंद्र को पराजित किया, वरुण देव का राजछत्र छीना और देवमाता अदिति के दिव्य कुंडलों का हरण कर उनका घोर अपमान किया। क्रूरता की पराकाष्ठा करते हुए उसने 16,100 निष्पाप राजकुमारियों का अपहरण कर उन्हें अपने किले में बंदी बना लिया।
अपमानित और विवश इंद्र देव न्याय की याचना लेकर द्वारका पहुँचे। धर्म के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण यह भली-भाँति जानते थे कि अब नरकासुर के अधर्म का अंत होना ही चाहिए। किंतु नरकासुर को एक विशेष वरदान प्राप्त था—उसका वध केवल उसकी माता भूदेवी के हाथों ही संभव था।
भगवान कृष्ण की लीला और नीति यहीं प्रकट होती है। उन्होंने अपनी पत्नी सत्यभामा को—जो स्वयं भूदेवी का अवतार थीं—युद्ध में साथ चलने का आग्रह किया। इस प्रकार श्रीकृष्ण अधर्म के विनाश के लिए उसी कारण को साथ ले चले, जो उसके अंत का माध्यम बनना था।



गरुड़ पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्ण और सत्यभामा प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। यह नगर जल, अग्नि और वायु की अभेद्य बाधाओं से सुरक्षित था और इसकी रक्षा ‘मुर’ नामक भयंकर राक्षस कर रहा था। भगवान श्रीकृष्ण ने पहले मुर का वध किया—इसी कारण वे मुरारी कहलाए। तत्पश्चात सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा से नगर की रक्षा-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया।


अपने सेनापति के वध से क्रोधित नरकासुर विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में उतरा। भयंकर संग्राम हुआ। भविष्यवाणी के अनुसार सत्यभामा ने भी युद्ध में भाग लिया। जब नरकासुर ने त्रिशूल से श्रीकृष्ण पर प्रहार करने का प्रयास किया, तब भगवान ने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। चक्र ने उसकी समस्त सुरक्षा को भेदते हुए उसका मस्तक पृथ्वी पर गिरा दिया।
धरती का पुत्र धरती में ही विलीन हो गया—अहंकार का अंत परमात्मा द्वारा कर दिया गया।


नरकासुर के वध के साथ ही संसार से अंधकार छँट गया। भूदेवी प्रकट हुईं और अदिति के चुराए हुए कुंडल श्रीकृष्ण को सौंपे। तत्पश्चात भगवान महल में गए और 16,100 राजकुमारियों को मुक्त कराया।
वे राजकुमारियाँ समाज के तिरस्कार से भयभीत थीं, किंतु करुणा-सागर श्रीकृष्ण ने उन सभी को स्वीकार किया, उन्हें अपनी रानियों का सम्मान दिया और उनके खोए हुए गौरव, सुरक्षा और आत्मसम्मान को पुनः स्थापित किया।


यह लीला केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक संदेश है—
जहाँ ज्ञान (कृष्ण) का प्रकाश होता है, वहाँ अहंकार (नरकासुर) का विनाश निश्चित होता है।


इसी विजय की स्मृति में नरक चतुर्दशी—दीपावली से एक दिन पूर्व—मनाई जाती है।
🙏 जय श्रीकृष्ण 🌿

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