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श्रीचैतन्य महाप्रभु की यह प्रार्थना भक्ति की पराकाष्ठा का दिग्दर्शन कराती है।

**न धनं न जनं न सुन्दरीं, कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे, भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि।।

— श्रीमन्महाप्रभु**

श्रीचैतन्य महाप्रभु की यह प्रार्थना भक्ति की पराकाष्ठा का दिग्दर्शन कराती है। प्रभु कहते हैं — “हे जगदीश्वर! मैं आपसे न धन की कामना करता हूँ, न जनसमूह की, न सुंदर स्त्री की, न ही काव्यकला की। मेरी तो एक ही प्रार्थना है — जन्म-जन्मांतर तक आपमें मेरी अहेतुकी भक्ति बनी रहे।”

यह निष्काम भाव ही भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है। सामान्यतः जीव माया से मोहित होकर अनादिकाल से श्रीहरि के चरणों को विस्मृत कर सांसारिक विषयों — धन, पद, प्रतिष्ठा और परिवार — की कामना करता आया है। इसी वासना के कारण वह कर्मचक्र में फँसकर जन्म-जन्मांतर तक विविध योनियों में भ्रमण करता रहता है।

जब किसी पुण्य संस्कारवश मनुष्य को दुर्लभ मानव देह प्राप्त होती है, और महापुरुषों की कृपा से भगवत्पथ प्राप्त होता है, तब भी यदि वह श्रीभगवान से सांसारिक इच्छाएँ करता है, तो यह उसकी दुर्बुद्धि है।

दोहे:

भक्ति करे जो लोभ से, माँगे धन संसार।
सोई भजन कहावतौ, दरपन बिन सिंगार।।

मांगूँ न मोती मान को, न चहुँ पद-विलास।
चाहे केवल नाम तव, और न दूजी आस।।

वासना का अंश भी यदि मन में शेष रह जाए, तो साधन भजन करते हुए भी जीव भगवान के प्रेमरस का पूर्ण स्वाद नहीं ले पाता। अहेतुकी भक्ति अर्थात् बिना किसी स्वार्थ के की गई सेवा ही वह मार्ग है, जिससे श्रीराधा-कृष्ण की कृपा सहज में प्राप्त होती है।

पद:

चाहे जनम जनम धरूँ, विषम योनि अपार।
नाम तव मुख मों बसै, मंगूँ यही उपहार।।

अतः साधक को चाहिए कि वह मन से समस्त सांसारिक वासनाओं को त्याग कर केवल भगवद्भक्ति की शरण ले। जब तक ‘मुझे कुछ चाहिए’ की भावना रहेगी, तब तक भक्ति ‘सौदा’ बनी रहेगी, सेवा नहीं।

राधे राधे।

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