
लौकिक एवं अलौकिक भाग्य
प्रत्येक जीव का अपना एक लौकिक भाग्य होता है। इस लौकिक भाग्य के प्रभाव से उसे धन, परिवार, स्त्री, पुत्र, मान-सम्मान, वैभव, और स्वर्गादि की प्राप्ति होती है। परंतु यह सब नश्वर और अनित्य है। काल के प्रवाह में बहकर एक दिन यह सब समाप्त हो जाता है, जैसे तिनकों का ढेर जलकर राख हो जाता है।
किन्तु, इसके विपरीत, दूसरा भाग्य अलौकिक अथवा अनिर्वचनीय होता है। यह भाग्य अत्यंत दुर्लभ है और केवल ईश्वर-कृपा से प्राप्त होता है। इस भाग्य से जीव के हृदय में भक्ति का बीज अंकुरित होता है, भजन करने की सहज प्रेरणा प्राप्त होती है, और वह श्रीभगवान के नाम, रूप, लीला और रस का सच्चा आस्वादन कर पाता है। अलौकिक भाग्य के बिना भजन संभव नहीं है।
कई बार लोग दीक्षा लेते हैं, कंठी धारण करते हैं, संत-वेश अपनाते हैं, परन्तु फिर भी उनके मन में भजन के प्रति अनुराग उत्पन्न नहीं होता।
ऐसा क्यों?
क्योंकि भजन के लिए केवल बाह्य आचार्य ही पर्याप्त नहीं है, भगवान की कृपा आवश्यक है।
श्रीपाद जीव गोस्वामी जी स्पष्ट कहते हैं कि भजन करने की शक्ति भी स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा से आती है। जिन पर भक्त भगवान की अनुग्रह-दृष्टि होती है, वही नाम, रूप, लीला और रस का वास्तविक आस्वादन कर पाते हैं।

अतः हमें अपने प्रयासों पर गर्व करने के स्थान पर श्रीभगवान की कृपा पर पूर्णतः निर्भर रहना चाहिए। हमें अपने गुरुदेव, संतों और श्रीवैष्णवों से कृपा की याचना करनी चाहिए, क्योंकि कृपा के बिना कोई भी जीव भक्ति-पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता।
हे प्रभु! कृपा कीजिए।
हे गुरुदेव! कृपा कीजिए।
हे वैष्णवजन! कृपा कीजिए।
शरणागत जीव का एक ही संकल्प होना चाहिए—कृपा की याचना।
राधे राधे!

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