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कभी-कभी भक्ति करने को मन नहीं करता? – प्रेरक कथा

कभी-कभी भक्ति करने को मन नहीं करता? – प्रेरक कथा

एक बार एक जिज्ञासु भक्त ने गोस्वामी तुलसीदास जी से पूछा, “कभी-कभी ऐसा होता है कि भक्ति करने का मन ही नहीं करता। फिर भी जबरन नाम जपने के लिए बैठ जाते हैं। क्या ऐसा करने से भी कोई फल मिलता है?”

तुलसीदास जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया:

“तुलसी मेरे राम को, रीझ भजो या खीज।
भौम पड़ा जामे सभी, उल्टा-सीधा बीज॥”

तुलसीदास जी समझाने लगे, “जिस प्रकार भूमि में बोये गए बीजों का सीधा या उल्टा होना फसल की उपज पर प्रभाव नहीं डालता, उसी प्रकार श्रीराम नाम का स्मरण जैसे भी किया जाए, वह व्यर्थ नहीं जाता। प्रभु नाम सदा फलदायी है। चाहे प्रेम से किया जाए, चाहे अनमने मन से, उसकी महिमा अपरंपार है। भक्ति की यह सुंदरता है कि वह प्रयास से शुरू होती है, लेकिन अंत में प्रभु कृपा का रूप ले लेती है।”

तुलसीदास जी ने आगे एक सुंदर दोहा कहा:

“राम जैसा नगीना नहीं सारे जग की बजरिया में।
नील मणि ही सजाऊँगा नयनो की पुतलिया में॥”

इसका अर्थ है कि संसार में श्रीराम जैसा रत्न और कोई नहीं। ऐसे दुर्लभ रत्न को मन और हृदय के नेत्रों में सजाना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।

इस प्रेरक कथा से यह शिक्षा मिलती है कि प्रभु नाम का स्मरण कभी निष्फल नहीं होता। यदि मन चंचल है, तब भी जप करते रहना चाहिए। धीरे-धीरे मन शांत हो जाएगा और प्रभु का नाम अमृत बनकर जीवन को संवार देगा।

शिक्षा:
भक्ति में निरंतरता और धैर्य आवश्यक है। चाहे मन की स्थिति कैसी भी हो, प्रभु का नाम लेने से हमें उनके प्रेम का आशीर्वाद अवश्य मिलता है। भक्ति के प्रयास से ही आध्यात्मिक जीवन में आनंद और सफलता संभव है।

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