हरिनाम संकीर्तन: भक्ति का मंगलमय प्रकाश | विद्या एवं भक्ति का प्राण तत्व
श्रीहरिनाम संकीर्तन जीव के मंगल रूप कुमुद के विकास के लिए ज्योत्सना के समान है। जिस प्रकार चंद्रिका (चंद्रमा की ज्योत्सना) अपने प्रकाश से कुमुद-कुसुम को प्रफुल्लित कर देती है, उसी प्रकार श्रीनाम संकीर्तन भी मनुष्य के मंगल रूप कुमुद को प्रकाशित कर देता है और भक्ति के पुष्प को विकसित करता है।
श्रेयः या मंगल भक्ति की ओर इंगित करता है। जब तक जीव देह-देहकादि के शुभ-अशुभ के प्रति आसक्त रहेगा, तब तक उसे संसार के दुखमय गर्त में नाना योनियों में भ्रमण करना ही पड़ेगा। किन्तु श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन देह-देहकादि के इस मिथ्या आवेश को नष्ट कर जीव को परम मंगलमय भक्ति साधन कुमुद के विकास हेतु प्रकाशित करता है। इससे साधक के हृदय में श्रवण, कीर्तन, वंदन, स्मरण आदि भक्ति के अंगों द्वारा निष्ठा एवं रुचि की वृद्धि होती है और वह धन्य हो जाता है।
विद्यावधु-जीवनम्: श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन का ज्ञान में महत्व
श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन विद्या रूपी वधू का प्राणस्वरूप है। विद्या का अर्थ ज्ञान है, और आध्यात्मिक ज्ञान दो प्रकार का होता है—निर्विशेष ब्रह्मज्ञान एवं सविशेष भगवतज्ञान। इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान की सार्थकता श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन में ही है।
निर्विशेष ब्रह्मज्ञानी की साधना भी श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन के बिना निष्प्राण है। कारण यह है कि—
“भक्ति बिना कौन साधन दिते नारे फल।सब फल देय भक्ति स्वतंत्र प्रबल॥”
– (चैतन्य चरितामृत)
श्रीमद्भागवत में कहा गया है—
“सा विद्या तन्मतिर्यया”
– अर्थात जिसके द्वारा भगवत चरणों में बुद्धि की अचल स्थिति होती है, वही भक्ति ही वास्तविक विद्या है।
भक्ति देवी सर्वदा मधुर एवं मंगलमय होती हैं। प्राण रहने पर ही शरीर में सौंदर्य और गति होती है, अन्यथा वह निष्प्राण होकर व्यर्थ हो जाता है। ठीक उसी प्रकार, नाम संकीर्तन विहीन भक्ति साधना भी निष्फल एवं निष्प्राण होती है।
अतः जो भी साधक भगवत कृपा एवं भक्ति की मधुरता को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेना चाहिए। यही मंगल का वास्तविक स्वरूप है।
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