प्रश्न – गोपीभाव क्या है?
उत्तर –
भोगों की केवल महत्ता ही नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का भी जहाँ लोप हो जाए और त्याग की स्मृति तक शेष न रहे—वही अवस्था ‘गोपीभाव’ कहलाती है।
गोपीभाव का अर्थ वैराग्य का प्रदर्शन नहीं है, अपितु ऐसा प्रेम है जिसमें स्वयं के सुख की कामना का पूर्ण विसर्जन हो जाता है। वहाँ न त्याग का अहंकार रहता है, न भोग की आकांक्षा—केवल प्रियतम की तुष्टि ही जीवन का एकमात्र प्रयोजन बन जाती है।
यह भाव सर्वसमर्पण का चरम रूप है, जहाँ ‘मैं’ का भाव गलकर केवल ‘वे’ रह जाते हैं।

प्रश्न – गोपी-प्रेम किसे कहते हैं?
उत्तर –
“केवल श्यामसुन्दर ही मेरे हैं और मैं केवल श्यामसुन्दर की हूँ”—
इस अनन्य, निर्विकल्प और अविचल भाव के साथ जब श्रीकृष्ण से नित्य, आत्मिक और एकमात्र संबंध स्थापित हो जाता है, वही ‘गोपी-प्रेम’ कहलाता है।
गोपी-प्रेम में अधिकार नहीं, अपेक्षा नहीं और प्रतिफल की कोई कामना नहीं होती। वहाँ प्रेम इसलिए नहीं है कि श्रीकृष्ण सुख देते हैं, बल्कि इसलिए है कि श्रीकृष्ण ही जीवन हैं।
यही प्रेम श्रीकृष्ण को भी बाँध लेता है—
इसीलिए कहा गया है कि भगवान भक्त के वश में होते हैं, पर गोपी-प्रेम में तो स्वयं भगवान भी हार जाते हैं।
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