📖 श्रीभगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 35
श्री भगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35।।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निस्संदेह मन बड़ा चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परंतु हे कुन्तीपुत्र! इसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।
✨ व्याख्या
मन का स्वभाव चंचल है। साधारण व्यक्ति इसे रोकने का प्रयास करता है, परंतु वह सफल नहीं हो पाता। श्रीकृष्ण यहाँ बताते हैं कि —
- अभ्यास (Practice) : निरंतर साधना, ध्यान, जप और आत्मनियंत्रण।
- वैराग्य (Detachment) : इन्द्रिय सुखों और आसक्तियों से दूरी।
इन दोनों के मेल से मन पर नियंत्रण संभव है और योगी अपनी आध्यात्मिक यात्रा में सफलता प्राप्त करता है।

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