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गौ संग खेलत बाल गोपाल।

गौ संग खेलत बाल गोपाल।
पकरि दुहुँन कर गौ मुख चूमत, पुनि पुनि सहरावत गौ भाल ॥
कबहुँक खींचत श्रुतिपट कबहुँक, पकरत धेनुहिं शृंग विशाल।
कंठ पकरि करि हृदय लगावत, पुनि सों पहिरावत जयमाल ॥
किलकि किलकि करि करत किल्लोलिन, नाचत जनु सम राज मराल।
गौ थन मुख धरि जनु बछरन सम, पीवन चाहत दुग्ध रसाल ॥
होत प्रसन्न अरु करत प्रदीक्षण, संग बजावत निज कर ताल।
करत प्रदर्शित मोद मूँदि चख, पाय सुरभि निज गौ प्रतिपाल ॥
लखि गो अरु गोपाल की झाँकी,
रसिक “श्वेत” जन होत निहाल ॥


🔹 भावार्थ (परिष्कृत)
नन्हें बाल गोपाल अपनी गौओं के साथ आनंदपूर्वक खेल रहे हैं। वे अपने कोमल हाथों से गौ माता का मुख पकड़कर प्रेम से चूमते हैं और बार-बार उसके मस्तक को सहलाते हैं।


कभी वे गाय के कान खींचते हैं, कभी उसके विशाल शृंग पकड़ लेते हैं। कभी गौ के कंठ को थामकर उसे अपने हृदय से लगा लेते हैं और कभी माता यशोदा द्वारा गूँथी गई जयमाला को प्रेमपूर्वक उसके गले में पहना देते हैं।


किलकारियाँ भरते हुए, अत्यन्त प्रसन्न बाल गोपाल उसके साथ क्रीड़ा करते हैं और मानो राजहंस के समान नृत्य कर रहे हों। वे गौ के थन को अपने मुख में धारण करते हैं, जैसे बछड़ा करता है, और अमृततुल्य मधुर दुग्ध का पान करना चाहते हैं।


प्रसन्नचित्त होकर वे गौ माता की प्रदक्षिणा करते हैं और साथ-साथ घूमते हुए ताली भी बजाते हैं। अपने प्रतिपालक को समीप पाकर गौ माता भी उनके स्पर्श से तृप्त होकर नेत्र मूँद लेती हैं और अपने प्रेम का भाव प्रकट करती हैं।


वास्तव में गौ के रूप में स्थित पृथ्वी माता भी द्वापर युग में अपने रक्षक श्रीकृष्णावतार भगवान को पाकर हर्षित हो रही हैं। इस मनोहर, रमणीय और अलौकिक गो-गोपाल की झाँकी को देखकर केवल शुद्ध हृदय वाले रसिक जन ही निहाल होकर इस दिव्य रस का आस्वादन कर पाते हैं।

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