श्रीगौरांग महाप्रभु के अवतार से पूर्व भारतवर्ष, विशेषतः बंगाल की स्थिति आध्यात्मिक, सामाजिक और नैतिक दृष्टि से अत्यंत दयनीय हो चुकी थी। यह काल कलियुग का प्रभावी चरण था, जहाँ धर्म का स्वरूप बाह्य आडंबर में सिमट गया था और उसका वास्तविक उद्देश्य—भगवान-प्रेम—लगभग विस्मृत हो चुका था। समाज में पाखंड, अहंकार और स्वार्थ का बोलबाला था। विद्वत्ता का मूल्य भक्ति से अधिक माना जाने लगा था, और शास्त्रों का अध्ययन केवल वाद-विवाद, तर्क और दूसरों को पराजित करने के लिए किया जाता था, न कि आत्मशुद्धि या ईश्वर-प्राप्ति के लिए।
बंगाल, विशेषकर नवद्वीप क्षेत्र, उस समय विद्या का बड़ा केंद्र था, परंतु यह विद्या भक्ति-विहीन थी। पंडितों में अत्यधिक गर्व था; वे स्वयं को श्रेष्ठ मानते और सामान्य जन को तुच्छ समझते थे। कर्मकांड अपने चरम पर था—यज्ञ, व्रत और विधियों का प्रदर्शन तो था, पर हृदय में करुणा, दया और भगवान के प्रति प्रेम का अभाव था। जाति-भेद इतना कठोर हो चुका था कि नीच माने जाने वाले वर्गों को हरिनाम तक से वंचित कर दिया गया था। यह मान लिया गया था कि भक्ति केवल कुछ विशेष वर्गों की ही संपत्ति है।
राजनीतिक दृष्टि से भी स्थिति अस्थिर थी। बंगाल मुस्लिम शासकों के अधीन था, जिससे हिंदू समाज भय, असुरक्षा और हीनभावना से ग्रस्त था। धार्मिक स्वतंत्रता होते हुए भी समाज भीतर से टूट चुका था। नैतिक पतन बढ़ रहा था—मद्यपान, व्यभिचार, हिंसा और कपट को सामान्य जीवन का हिस्सा माना जाने लगा था। साधु-संतों की वाणी कम सुनाई देती थी और जो वास्तविक भक्त थे, वे समाज में उपेक्षित थे।
ऐसे अंधकारमय समय में, जब धर्म केवल नाममात्र रह गया था और जीव ईश्वर से दूर होता जा रहा था, तब करुणा के सागर श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीगौरांग महाप्रभु के रूप में अवतार लिया। उनका अवतार इस पतित समाज को नवजीवन देने, हरिनाम के प्रकाश से अज्ञान के अंधकार को दूर करने और यह सिद्ध करने के लिए हुआ कि भगवान-प्रेम किसी जाति, योग्यता या काल का बंधन नहीं मानता। श्रीगौर के प्राकट्य से पहले का भारत और बंगाल वास्तव में उस दिव्य करुणा की प्रतीक्षा कर रहा था, जो हर हृदय को स्पर्श कर सके।
जय श्रीगौर हरि!
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