
दुष्ट मन! तुम किस प्रकार के वैष्णव हो?
हे दुष्ट मन! तुम अपने आप को किस प्रकार का वैष्णव समझते हो? एकांत स्थान में भगवान श्री हरि के पवित्र नाम का जप करने का जो तुम दिखावा कर रहे हो, वह क्या वास्तव में शुद्ध भक्ति है? या मात्र संसार में प्रतिष्ठा पाने का पाखंड?
हे मन! जान लो कि यह दिखावटी वैष्णवता केवल सांसारिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयास मात्र है, जो अंततः व्यर्थ सिद्ध होगा। यह झूठी प्रतिष्ठा तो उसी प्रकार घृणास्पद है जैसे सूअर का मल—जिसमें कोई भी वास्तविक संतोष प्राप्त नहीं कर सकता। क्या तुम नहीं जानते कि यह सब माया का ही एक भ्रम है?
संसार की नश्वरता को समझो
धन, स्त्री और भौतिक सुखों के भोग की योजनाओं में दिन-रात लीन रहकर तुम क्या प्राप्त कर लोगे? ये सभी वस्तुएँ क्षणभंगुर हैं, मृत्यु के साथ नष्ट हो जाएँगी। इनकी प्राप्ति के लिए किया गया प्रयास केवल आत्म-विनाश का मार्ग है।
सच्ची वैष्णवता का मार्ग

यदि वास्तव में वैष्णव बनना चाहते हो, तो पाखंड छोड़ो और निश्छल भक्ति का आश्रय लो। भगवान के नाम का स्मरण केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अंतर से प्रेमपूर्वक करो। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है—
“कब तुम अहंकार को त्यागकर, निश्छल होकर हरिनाम का सच्चा आश्रय लोगे?”

संसार के नश्वर सुखों को त्यागो, सच्चे वैष्णव आचार्यों के मार्ग पर चलो, और शुद्ध भक्ति में मन को स्थिर करो। यही जीवन का परम लक्ष्य है।
शुद्ध भक्ति की ओर अग्रसर होओ, तभी सच्चे वैष्णव बन सकोगे!


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