
सन्त वाणी
जिनके हृदय में प्रगाढ़ दिव्य प्रेम बसता है, जिनकी आत्मा करुणा के भाव से आप्लावित होती है, वे ही वास्तव में भगवान की कृपा के अधिकारी बनते हैं। प्रेम और करुणा से भरा मनुष्य न केवल स्वयं आनंदित रहता है, बल्कि वह अपने सम्पर्क में आने वाले हर प्राणी के जीवन को भी मधुर बना देता है।
परन्तु जो लोग प्रेम और करुणा को त्यागकर राग, द्वेष, और प्रतिशोध की आग में जलते रहते हैं, वे सदैव अशांत, दुखी और चिंताओं से घिरे रहते हैं। उनका मन संसार के विषम जाल में उलझकर न तो सुख पाता है और न ही शांति।
“प्रेम करुणा संग रहै, तजै विरोध विकार।
राग द्वेष जौ मोह में, मिटे न संताप अपार।।”
अतः जो शांति और आनंद की खोज में हैं, उन्हें चाहिए कि वे अपने हृदय को प्रेम और करुणा से भरें, जिससे ईश्वर कृपा स्वरूप उनके जीवन में अनंत शांति और दिव्य प्रकाश प्रकट हो सके।


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