Press "Enter" to skip to content

भगवद् गीता: अष्टम अध्याय – अकीर्तिम योग

भगवद् गीता: अष्टम अध्याय – अकीर्तिम योग

अष्टम अध्याय को “अकीर्तिम योग” कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बताते हैं कि मृत्यु के समय मनुष्य का ध्यान किस ओर होना चाहिए। यह अध्याय आत्मा की अमरता, जीवन के विभिन्न चरणों, और भक्ति के महत्व पर केंद्रित है। भगवान बताते हैं कि जिनका ध्यान हमेशा उनके प्रति स्थिर रहता है, वे ही सच्चे योगी हैं और मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 5:

**उर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था, रजसो जाति रजस्विनः।
तमस्तु ति गताः, दुष्कृतिनः॥5॥

अनुवाद:
जो व्यक्ति सत् गुणों में स्थित होते हैं, वे ऊँचाई की ओर जाते हैं। जो राजसी गुणों वाले होते हैं, वे मध्य की ओर जाते हैं, और जो तामसी गुणों वाले होते हैं, वे अधः की ओर जाते हैं।

भावार्थ:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि आत्मा की यात्रा जीवन के गुणों के आधार पर होती है। जो व्यक्ति सद्गुणों से युक्त है, वह उच्च लोकों की ओर जाता है, जबकि जो व्यक्ति राजसी और तामसी गुणों से भरा है, वे अधः की ओर जाते हैं। इसलिए, व्यक्ति को सद्गुणों का पालन करना चाहिए, ताकि उसकी आत्मा उन्नति कर सके।

दोहा:

“सत गुणों की जो धारा, उसे धारण कर चल।
उर्ध्वगति का मार्ग पाकर, मोक्ष का सागर फल॥”

इस दोहे में सत् गुणों के महत्व और उनके माध्यम से उर्ध्वगति की प्रेरणा दी गई है।

शिक्षाप्रद कहानी: भृगु ऋषि की कथा

एक बार, भृगु ऋषि ने सोचा कि भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। उन्होंने यह विचार किया कि कौन सर्वोत्तम है। उन्होंने पहले भगवान ब्रह्मा और फिर भगवान शिव का ध्यान किया। लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए। अंत में, भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और उन्होंने पाया कि भगवान विष्णु सबके लिए सर्वस्व हैं।

भगवान विष्णु ने उन्हें कहा, “जो व्यक्ति सच्चे प्रेम से मुझे याद करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। मैं सच्चे भक्तों का ध्यान रखता हूँ।”

शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चे ध्यान और भक्ति का फल सर्वोच्च है। भगवान की भक्ति में स्थिर रहने से व्यक्ति को असीम आनंद और शांति मिलती है।

महत्त्व:

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता के साथ-साथ भक्ति के महत्व को समझाते हैं। आत्मा कभी नष्ट नहीं होती और यह केवल शरीर की मृत्यु से परे रहती है। इसलिए, व्यक्ति को हमेशा अपने मन को भगवान में लगाना चाहिए, ताकि मृत्यु के समय आत्मा का ध्यान उस पर केंद्रित हो सके।

श्लोक 14:

**सर्वधर्मान्परित्यज्य मां एकं सरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा सूचः॥14॥

अनुवाद:
सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा। तुम भयभीत न हो।

भावार्थ:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भक्ति और शरणागति का मार्ग ही मुक्ति का सही उपाय है। सभी प्रकार के धर्म और कर्मों को छोड़कर, केवल भगवान की शरण में आने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो सकता है। इस श्लोक का संदेश यह है कि केवल ईश्वर की भक्ति ही सच्चा धर्म है।

शिक्षाप्रद कहानी: नीलकंठ की कथा

एक समय की बात है, जब भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान निकले हुए विष को अपने कंठ में धारण किया। उन्होंने यह विष पीकर उसे अपने कंठ में रोक लिया, ताकि संसार को कोई हानि न हो। इस प्रकार, भगवान शिव ने अपनी भक्ति और दया से संसार को बचाया।

जब देवी पार्वती ने देखा कि भगवान शिव ने विष का पान किया है, तो उन्होंने चिंता व्यक्त की। भगवान शिव ने कहा, “मैं अपने भक्तों के लिए कुछ भी सहन कर सकता हूँ। मेरे भक्तों की भक्ति में जो शक्ति है, वह सब कुछ पार कर सकती है।”

शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि भगवान की भक्ति में अपार शक्ति होती है। जब भक्त सच्चे मन से भगवान की शरण में आते हैं, तब भगवान उनकी रक्षा करते हैं और उन्हें सभी कष्टों से मुक्त करते हैं।

महत्त्व:

इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि भक्ति के माध्यम से मनुष्य आत्मा की अमरता को समझ सकता है। आत्मा की भक्ति और ध्यान से उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। मृत्यु के समय अगर व्यक्ति का ध्यान भगवान पर केंद्रित रहता है, तो वह निश्चित रूप से उच्च लोकों की ओर जाता है।

समापन:

इस प्रकार, अष्टम अध्याय का अध्ययन हमें सिखाता है कि जीवन के अंतिम क्षणों में मन का ध्यान भगवान पर होना चाहिए। भक्ति का मार्ग ही आत्मा को उच्चता की ओर ले जाता है, और यही सच्चा ज्ञान है। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश हमें सिखाते हैं कि हम सदा उनके प्रति समर्पित रहें और उनकी भक्ति करें।

Comments are closed.

You cannot copy content of this page