भक्तिरसामृतसिन्धु ग्रंथ श्रील रूप गोस्वामी जी ने लिखा है।
🔸 यह ग्रंथ गौड़ीय वैष्णव दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण शास्त्र है,
जिसमें भक्ति के स्वरूप, प्रकार, भाव, रस और साधना का विस्तार से वर्णन किया गया है।
🔸 इसे श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं का सार कहा जाता है।
महाप्रभु ने स्वयं श्री रूप गोस्वामी जी को वृंदावन जाकर भक्ति-रस का प्रचार करने का आदेश दिया था,
और उसी आदेश के पालन में यह दिव्य ग्रंथ रचा गया।
🪔 इस ग्रंथ का प्रसिद्ध श्लोक —
अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥
(भक्तिरसामृतसिन्धु 1.1.11)
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