🍃 आज गौड़ीय वैष्णवाचार्य रसिक कुल मुकुटमणि श्री रूपकवीश्वर गोस्वामी जी महाराज ( 1624 – 1684 ) की तिरोभाव महोत्सव है । 🍃
बड़ी सूरमाकुञ्ज वृन्दावन में विविध आयोजनों के साथ उत्सव मनाया जा रहा है ।। 💐
इनका संक्षिप्त चरित्र नीचे प्रस्तुत किया गया है —
श्रीरूपकवीश्वर गोस्वामी जी ने अपनी विद्वता एवं अमृतमयी वाणी के द्वारा जगत में कृष्ण भक्ति का प्रचार किया । पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के अंतर्गत सैदाबाद ग्राम में इनका जन्म हुआ ।
सोलह वर्ष की आयु में ब्रज धाम आकर श्रीमुकुंददास जी से दीक्षा एवं वेष ग्रहण किया । ग्रंथों का अध्ययन करके जगत विद्वान की उपाधि से अलंकृत हुए । अनेक नगरों में मंदिर बनवाकर श्रीविग्रह की प्राण प्रतिस्ठा करवाई ।
जयपुर में स्वकीया – परकीया भाव के विषय मे विवाद हुआ जिसमें इन्होंने अपनी विद्वता से सभी विद्वानों को सन्तुष्ट किया, इसलिए जयपुर नरेश ने इन्हें ‘सूरमा’ की उपाधि प्रदान की ।
श्री रूपकवीश्वर जी अपने श्री गुरुदेव भगवान की प्राणभरी सेवा करते थे । गोस्वामी श्रीमुकुंददास जी अति वृद्ध हो चुके थे । अब स्वयं श्री राधानयनानंदजी की सेवा सुचारु रूप से नहीं कर पा रहे, रूपकवीश्वर जी की तीव्र भजन निष्ठा तथा गाढ़ानुराग देखकर उन्हें अपने प्राणाराध्य श्री राधानयनानंदजी की सेवा सौंप दी ।
श्रीगुरुसेवा के साथ भगवद सेवा प्राप्त करके रूपकवीश्वर जी प्रेम में विभोर हो गये । ये नित्य छः घड़ी रात्रि रहते उठकर अपनी स्नानादि नित्य क्रिया कर लेते । तत्पश्चात श्री गुरुजी को पाद संवाहन करते हुए जगाकर शौच को ले जाते अपने हाथों से अंगमार्जन तथा स्नानादि कराते। प्रतिदिन दोनों संध्या गुरु की सात बार परिक्रमा लगाते एवं 100 बार साष्टांग प्रणाम करते। भगवद बुद्धि से श्री गुरुदेव भगवान की परम भक्तिभाव पूर्वक सेवा करते । साथ – साथ चलती श्री राधानयनानंद जी की प्रेमभरी सेवा ।।
रूपकवीश्वर जी नगर नगर में भक्ति का प्रचार करते रहे। महाप्रभुजी की सभी लीला स्थलियों के दर्शन के पश्चात नयनानंद जी के आग्रह पर ‘ थुरिया ‘ नामक ग्राम में रुक गये।
विजयादशमी के पूर्व नवमी के दिन अपने अंतरंग शिष्यों से बोले – कल हम वृन्दावन जायेंगे। इस रहस्य को किसी ने नहीं समझा। उस दिन उपवास रहकर रात्रि में थोड़ा सा दूध प्रसाद पीकर संकीर्तन करते रहे । प्रातःकाल होते ही संकीर्तन के बीच में से अचानक अंतर्धान हो गये। उसी रात स्वप्न में शिष्यों से कहा – ‘ में वृन्दावन की नित्य निकुंज में आ गया हूँ तुम दुःखी मत हो ‘। उसी दिन वृन्दावन में सन्तों ने सूरमाकुंज में उन्हें बैठे भजन करते हुए देखा ।

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