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आसक्ति की अवस्था : साधन से श्रीभगवान में सम्पूर्ण आकर्षण

रूचि से ही धीरे-धीरे आसक्ति उत्पन्न होती है। जब साधक की चित्तवृत्ति आसक्ति की अवस्था में पहुँचती है, तब उसका मन केवल साधन-भजन की बाह्य क्रियाओं में नहीं रमता, अपितु भजनीय विषय स्वयं श्रीभगवान में अनायास ही आकर्षित हो जाता है।

आसक्ति की अवस्था में भगवान भक्त के हृदय, मन और बुद्धि पर ऐसे व्याप्त हो जाते हैं कि उसका सम्पूर्ण जीवन—उसका हाव-भाव, बोल-चाल, आहार-विहार, आचरण—सब कुछ एक विशेष माधुर्य और अलौकिकता से ओतप्रोत हो जाता है। बाहर से देखने वाला उसे संसार से असंलग्न मान सकता है, परंतु वास्तव में वह संसार से विमुख नहीं, बल्कि भगवान के चरणारविन्द की प्राप्ति की तीव्र उत्कण्ठा से परिपूर्ण होता है।

यह उत्कण्ठा ही उसकी साधना, उसका जीवन और उसकी परम शक्ति बन जाती है। उसी में उसकी चेतना रमण करती है और उसी में उसका प्रत्येक क्षण विलीन होता है।

राधे राधे 🙏

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