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श्रीकृष्ण की अद्वितीय महिमा – माता कुंती की स्तुति

📖 श्रीमद्भागवत महापुराण (१.८.१८) – श्रीकृष्ण की अद्वितीय महिमा

श्लोक:

“नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृते: परम्।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम्॥”


🔹 कुंती माता द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति

यह श्लोक माता कुंती द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति का एक अंश है। वे अपने पुत्र समान स्नेही श्रीकृष्ण की परम दिव्यता और रहस्यमयी स्वरूप को पहचानते हुए उनकी स्तुति कर रही हैं।

“नमस्ये पुरुषं त्वाद्यम्”हे पुरुषोत्तम! मैं आपको साष्टांग प्रणाम करती हूँ। आप आदिपुरुष हैं, आप ही इस संपूर्ण सृष्टि के मूल कारण हैं।

“ईश्वरं प्रकृते: परम्”आप सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं और इस मायामयी प्रकृति से भी परे हैं। यद्यपि यह संसार आपके द्वारा संचालित हो रहा है, फिर भी आप प्रकृति के बंधनों से मुक्त हैं।

“अलक्ष्यं सर्वभूतानाम्”आप सभी जीवों के लिए अदृश्य हैं। आपकी लीला एवं स्वरूप को सामान्य लोग समझ नहीं सकते, क्योंकि आप योगमाया से ढके हुए रहते हैं

“अन्तर्बहिरवस्थितम्”आप प्रत्येक जीव के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर स्थित हैं।

  • अंतर्बहिरवस्थितम् का अर्थ यह है कि आप सभी के हृदय में आत्मारूप में विराजमान हैं, और साथ ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड में अपनी शक्ति से व्यापक रूप से विद्यमान हैं।
  • भक्तगण अपने हृदय में आपके दर्शन कर सकते हैं, लेकिन सामान्य जीव आपकी उपस्थिति को नहीं समझ पाते।

🔹 गौड़ीय आचार्यों की दृष्टि से विशेषता

🌿 श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि यह श्लोक दर्शाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी, वे दृष्टिगोचर भी हैं और अदृश्य भी

🌸 श्रील श्रीधर स्वामी बताते हैं कि भगवान की लीला और स्वरूप को केवल भक्तगण ही पहचान सकते हैं। वे यद्यपि अर्जुन और पांडवों के स्नेही रहे, फिर भी वे परमेश्वर हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार के कर्ता हैं

🌺 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि माता कुंती ने श्रीकृष्ण को परम सत्य, अदृश्य रूप में स्थित ईश्वर और सभी के हृदय में वास करने वाले साक्षात् भगवान के रूप में संबोधित किया है।

🌿 श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक को यह समझाने के लिए उद्धृत किया कि श्रीकृष्ण केवल माया से आवृत जीवों के लिए अदृश्य होते हैं, लेकिन उनके अनन्य भक्त उन्हें सदैव अनुभव कर सकते हैं


🌿 निष्कर्ष:

भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि के आदि पुरुष एवं परब्रह्म हैं।
वे इस भौतिक जगत से परे हैं और माया से अप्रभावित हैं।
यद्यपि वे सभी के भीतर और बाहर विद्यमान हैं, परंतु केवल भक्तगण ही उन्हें देख सकते हैं।
भगवान की सच्ची अनुभूति भक्ति के माध्यम से ही संभव है।

📖 श्रीमद्भागवत महापुराण (१.८.२१-२२) – भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति

श्लोक १.८.२१:

“कृष्णाय वासुदेवाय, देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय, गोविन्दाय नमो नमः॥”

यह श्लोक माता कुंती द्वारा भगवान श्रीकृष्ण की महान स्तुति का एक अंश है। इसमें वे भगवान के पाँच प्रमुख नामों का उल्लेख करती हैं, जो उनकी दिव्य लीलाओं और स्वरूप को दर्शाते हैं।

“कृष्णाय”हे कृष्ण! आप सबको आकर्षित करने वाले हैं।
‘कृष्ण’ शब्द का अर्थ है – जो अखिल रसामृत मूर्ति हैं, जो सभी जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति रखते हैं।

“वासुदेवाय”हे वासुदेव! आप वसुदेव जी के पुत्र हैं और सभी जीवों के भीतर व्याप्त हैं।
गौड़ीय आचार्य बताते हैं कि यहाँ वासुदेव शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है

  1. श्रीकृष्ण वसुदेव जी के पुत्र हैं।
  2. वे परम ब्रह्म हैं और सर्वत्र व्याप्त हैं।

“देवकीनन्दनाय च”हे देवकीनन्दन! आप माता देवकी के पुत्र हैं।
यद्यपि भगवान का जन्म देवकी जी के गर्भ से हुआ, लेकिन वे नित्य-सिद्ध हैं और उनकी उत्पत्ति किसी सामान्य जीव की भाँति नहीं हुई।

“नन्दगोपकुमाराय”हे नंदनंदन! आप गोपों के नायक हैं और नंद महाराज के लाडले पुत्र हैं।
श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यकाल की लीलाएँ गोकुल, वृंदावन और नंदगांव में गोप-बालकों के साथ कीं

“गोविन्दाय नमो नमः”हे गोविंद! मैं आपको बार-बार प्रणाम करती हूँ।
गोविंद का अर्थ है –

  1. गोपियों और गोपों के आनंददाता
  2. गायों, धरा और इन्द्रियों को संतुष्ट करने वाले भगवान

श्लोक १.८.२२:

“नम: पङ्कजनाभाय नम: पङ्कजमालिने।
नम: पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रलये॥”

“नम: पङ्कजनाभाय”हे कमलनाभ! आपको प्रणाम है।
श्रीकृष्ण के नाभि कमल से ही ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।

“नम: पङ्कजमालिने”हे कमल-माला धारण करने वाले प्रभु! आपको प्रणाम है।
भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य शोभा और उनकी अलंकार-परंपरा में कमल सदृश सौंदर्य और माधुर्य झलकता है।

“नम: पङ्कजनेत्राय”हे कमल-दृष्टि वाले प्रभु! आपको प्रणाम है।
भगवान श्रीकृष्ण के नेत्र विशाल, कोमल और कमल के समान सुंदर हैं। उनकी दृष्टि से जीव मोहित होकर प्रेम में डूब जाता है।

“नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रलये”हे कमल चरणों वाले प्रभु! मैं आपको बारंबार नमन करती हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण के पादपद्म ही समस्त भक्तों की अंतिम शरण हैं। उनकी चरण-वन्दना करने से मुक्ति प्राप्त होती है


गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत के अनुसार सार:

🌸 कुंती माता यहाँ श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों की स्तुति कर रही हैं, जिनमें वे समस्त ब्रह्मांड के स्वामी होते हुए भी अपने भक्तों के लिए सरल और प्रेममय स्वरूप धारण करते हैं।

🌿 गौड़ीय आचार्य इस श्लोक को भक्ति की महानता का प्रतीक मानते हैं, क्योंकि माता कुंती को भौतिक ऐश्वर्य की इच्छा नहीं थी; वे केवल भगवान के दिव्य चरणों की भक्ति चाहती थीं।

🌺 श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि माता कुंती इन श्लोकों के द्वारा हमें यह सिखा रही हैं कि संपत्ति, ऐश्वर्य, परिवार और मान-सम्मान नश्वर हैं, लेकिन कृष्ण-भक्ति ही सच्ची शरण है।


🌿 निष्कर्ष:

भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के लिए अत्यंत प्रेममयी और कृपामयी हैं।
श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की शरण में जाने से जीवन की समस्त पीड़ाएँ समाप्त हो जाती हैं।
गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के अनुसार, भगवान के नामों का कीर्तन और उनके स्वरूप का चिंतन ही मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

“जय श्रीकृष्ण! जय माता कुंती!”

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