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Bhagwatam1.1.1 श्रीमद्भागवत महापुराण 1.1.1 का अनुव्याख्यान

यह श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रथम श्लोक है, जो संपूर्ण ग्रंथ का आधार प्रस्तुत करता है। इसमें भगवान की परम सत्ता, ज्ञान, स्वतंत्रता, और सत्यस्वरूप का गुणगान किया गया है।

श्रीमद्भागवत महापुराण 1.1.1 का अनुव्याख्यान

श्लोक:

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः॥
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥

व्याख्या (शब्दार्थ एवं संरचना)

  1. जन्माद्यस्य यतः – जिस कारण (परब्रह्म) से इस सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार होता है।
    • जन्म – सृष्टि की उत्पत्ति।
    • आदि – स्थिति (पालन) और संहार भी।
    • यतः – जिससे (भगवान ही इसका कारण हैं)।
  2. अन्वयात् इतरतः च – जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सभी वस्तुओं में व्याप्त हैं।
    • अन्वय – प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित (जैसे भगवान का साकार रूप)।
    • इतरतः – अप्रत्यक्ष रूप से (निर्गुण ब्रह्म के रूप में)।
  3. अर्थेषु अभिज्ञः – जो हर अर्थ (तत्व) को पूर्ण रूप से जानते हैं।
    • भगवान ही पूर्ण ज्ञान रखते हैं और किसी अन्य से सीखने की आवश्यकता नहीं होती।
  4. स्वराट् – जो पूर्ण स्वतंत्र हैं।
    • उन्हें किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं, वे स्वयं भगवान हैं।
  5. तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये – उन्होंने ब्रह्म (वेदज्ञान) को हृदय में स्वयं आदिकवि ब्रह्माजी को प्रकट किया।
  6. मुह्यन्ति यत्सूरयः – जिनकी महिमा को समझने में बड़े-बड़े देवता भी मोहित हो जाते हैं।
  7. तेजोवारिमृदां यथा विनिमयः – जैसे अग्नि, जल और पृथ्वी में परस्पर परिवर्तन होता है।
    • यह संसार भी मिथ्या प्रतीत होता है, परंतु भगवान की सत्ता वास्तविक है।
  8. यत्र त्रिसर्गोऽमृषा – जिसमें यह त्रिगुणमयी सृष्टि (सत्त्व, रज, तम) सत्य प्रतीत होती है, किंतु वास्तव में यह माया से उत्पन्न है।
  9. धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं – उनके तेजस्वी धाम में कोई माया (भ्रम) नहीं होता।
    • भगवान का धाम (गोलोक वृंदावन) शुद्ध और सत्यस्वरूप है।
  10. सत्यं परं धीमहि – हम उस परम सत्यस्वरूप भगवान का ध्यान करते हैं।

अनुव्याख्या (गहरी व्याख्या एवं भावार्थ)

यह श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रथम श्लोक है, जो संपूर्ण ग्रंथ का आधार प्रस्तुत करता है। इसमें भगवान की परम सत्ता, ज्ञान, स्वतंत्रता, और सत्यस्वरूप का गुणगान किया गया है।

  1. भगवान ही सृष्टि के कारण हैं
    • वे सृष्टि, पालन और संहार के कारण हैं (जन्माद्यस्य यतः)।
    • यह ठीक उसी तरह है जैसे सूर्य की उपस्थिति से दिन, रात्रि और ऋतुएँ बदलती हैं, परंतु सूर्य स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होता।
  2. भगवान सर्वज्ञ और स्वतंत्र हैं
    • वे स्वराट् हैं, अर्थात् वे किसी अन्य से ज्ञान प्राप्त नहीं करते।
    • ब्रह्माजी को सृष्टि का ज्ञान उन्होंने ही प्रदान किया (तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये)।
  3. बड़े-बड़े देवता भी भगवान की महिमा को नहीं समझ सकते
    • यद्यपि देवता एवं ऋषि अत्यंत ज्ञानी हैं, फिर भी वे भगवान की अपार महिमा को पूर्ण रूप से नहीं जान सकते (मुह्यन्ति यत्सूरयः)।
  4. जगत असत्य नहीं, किंतु मायिक है
    • संसार में जो कुछ भी दिखता है, वह मायामय है, जैसे तेज (अग्नि), जल और पृथ्वी का परस्पर परिवर्तन होता रहता है (तेजोवारिमृदां यथा विनिमयः)।
    • परंतु यह भगवान की सत्ता से संचालित होता है और भगवान ही वास्तविक सत्य हैं (सत्यं परं धीमहि)।
  5. परम सत्य कौन है?
    • यह श्लोक हमें उस परम सत्य (परब्रह्म) की उपासना करने को प्रेरित करता है।
    • भगवान श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं, क्योंकि वे इस समस्त जगत के मूल कारण हैं।
  • सृष्टि का मूल कारण भगवान हैं, न कि केवल भौतिक प्रकृति।
  • वे सर्वज्ञ और स्वतंत्र हैं, वेदों के प्रणेता और ज्ञान के स्रोत हैं।
  • उनकी महिमा को बड़े-बड़े देवता भी पूर्णतः नहीं समझ सकते।
  • यह संसार परिवर्तनशील और मायामय है, लेकिन भगवान शाश्वत एवं सत्यस्वरूप हैं।
  • हमें उन श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए, जो परम सत्यस्वरूप हैं।

॥ सत्यं परं धीमहि ॥ – आइए, हम उस परम सत्यस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें।

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