भक्ति में आडंबर नहीं चाहिए होता
काशी में एक बार एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई। उसी समय एक आदमी आया और गाय के बारे में पूछने लगा। ब्राह्मणजी माला जप रहे थे, इसलिए बिना कुछ कहे हाथ से गली की ओर इशारा कर दिया। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि वह आदमी कसाई था और गाय उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थी। कसाई ने गाय को पकड़कर गोवध कर दिया।
इस अनजाने पाप के कारण ब्राह्मण अगले जन्म में कसाई परिवार में जन्मे। उनका नाम पड़ा सदना। पूर्व जन्म के पुण्यकर्मों के कारण, सदना उदार और सदाचारी स्वभाव के थे, लेकिन अपनी आजीविका के लिए मांस बेचते थे।
शालिग्राम की लीला
एक दिन सदना को नदी के किनारे एक पत्थर मिला, जिसे वे मांस तोलने के बाँट के रूप में उपयोग करने लगे। वे यह नहीं जानते थे कि वह पत्थर शालिग्राम भगवान थे। सदना जब ठाकुरजी के भजन गाते, तो शालिग्रामजी तराजू में झूलते हुए आनंदित होते।
एक दिन एक ब्राह्मण ने बाँट पर नज़र डाली और सदना को फटकारते हुए कहा, “यह कोई साधारण पत्थर नहीं, ये शालिग्राम भगवान हैं।” ब्राह्मण शालिग्रामजी को अपने घर ले गए और उनकी विधिपूर्वक पूजा करने लगे।
भगवान की सीख
रात्रि में शालिग्राम भगवान ब्राह्मण के सपने में आए और बोले, “मुझे सदना की भक्ति अधिक प्रिय है। वह अनजाने में भी मुझे भजता है। उसकी भावना में जो सच्चाई है, वह तुम्हारे आडंबर में नहीं। मुझे वापस वहीं छोड़ आओ।”
ब्राह्मण ने भगवान की आज्ञा मानी और शालिग्रामजी को सदना को लौटा दिया। सदना ने अपने अज्ञान से किए अपराध के लिए पश्चाताप किया और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े।
सदना की परीक्षा
यात्रा के दौरान, सदना पर एक झूठा आरोप लगाकर उन्हें अन्यायपूर्ण दंड दिया गया। उनके दाएँ हाथ को काट दिया गया। लेकिन सदना ने इसे अपने पूर्व जन्म के कर्म का फल मानकर सहन किया और भक्ति में लीन रहे।
जब सदना जगन्नाथपुरी पहुंचे, तो भगवान जगन्नाथ ने स्वयं अपने सेवक राजा को आदेश दिया कि उनके प्रियभक्त की स्वागत-सत्कार के साथ अगवानी की जाए।
भगवान का प्रेम
भगवान ने सदना को दर्शन देकर कहा, “तुम्हारे पिछले जन्म के कर्मों का हिसाब अब पूरा हो चुका है। तुम्हारी सच्ची भक्ति ने मुझे हर स्थिति में प्रसन्न किया। मांस तोलने वाले तराजू में भी मैं तुम्हारे प्रेम के कारण आनंदित हुआ। अब तुम निष्पाप हो गए हो और मोक्ष प्राप्त करोगे।”
शिक्षा
भक्त सदना की कथा सिखाती है कि भक्ति में आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। ईश्वर की भक्ति सच्चे प्रेम, समर्पण और भावना से होती है, न कि बाहरी दिखावे से। भगवान को सच्चा प्रेम और नाम का स्मरण सबसे प्रिय है।
“भाव प्रधान है भक्ति में, आडंबर से भगवान प्रसन्न नहीं होते। सच्ची भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है।”
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