कार्तिक मास में दीपदान की महिमा
श्लोक:
कार्तिके दीपदानं यः कुरुते परमं हरिं।
स याति परमं स्थानं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
अर्थ: जो कार्तिक मास में भगवान हरि को दीप अर्पण करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है।
कार्तिक मास में प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण को घी अथवा तिल के तेल का दीपक अर्पण करने की विशेष महिमा है। स्कंद पुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस मास में दीपदान करता है, उसके लाखों जन्मों के पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं।
दोहा:
पलभर दीप जला के, होय लाखों पाप नाश।
कार्तिके हरि पूजा से, हो जीवन का सुवास॥
दीपदान के पुण्य का महत्व
कार्तिक मास में दीप अर्पण करने से मनुष्य को सूर्य ग्रहण में कुरुक्षेत्र में स्नान करने या चन्द्र ग्रहण में स्नान करने से एक करोड़ गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इस माह में दीपदान करता है, वह मानो अश्वमेध यज्ञ के समान महापुण्य का अधिकारी बन जाता है।
शिक्षा:
यह दीपदान न केवल कर्मों का पवित्रीकरण करता है बल्कि व्यक्ति को शुभ संकल्प, आत्मसंयम, और सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी प्रदान करता है। इस महीने में किया गया एक छोटा सा दीपदान, व्यक्ति को जीवन में स्थायी शांति और भगवान की अनुकंपा प्राप्त करने का मार्ग है।
दोहा:
दीप अर्पण कार्तिके, मिटे संताप अपार।
नाथ कृपा सुलभ हो, होय भव सिंधु पार॥
सभी पापों का नाश
यह भी बताया गया है कि कार्तिक मास में दीपदान करने से मेरु पर्वत या मंदर पर्वत जितने विशाल पाप भी भस्म हो जाते हैं। त्रिलोकों में ऐसा कोई पाप नहीं है जो कार्तिक मास में भगवान केशव को दीप अर्पण करने से नष्ट न हो सके।
शिक्षा:
यह पर्व हमें अपनी भूलों से सीखकर, आत्मशुद्धि का एक अवसर प्रदान करता है। दीपदान के माध्यम से हम न केवल अपने पापों का नाश करते हैं, बल्कि आंतरिक शांति एवं सुख प्राप्त करने के लिए अपनी प्रवृत्तियों को पवित्र बनाते हैं।
दोहा:
संसार पाप निवृत्ति का, यही समय शुभ माने।
दीप अर्पण कार्तिक में, मन निर्मल हो जाने॥
पितरों की मुक्ति
पितर कहते हैं कि हमारे कुल में जब कोई कार्तिक मास में दीप अर्पण करता है, तो सुदर्शनधारी भगवान की कृपा से हम सबको मोक्ष प्राप्त होती है।
शिक्षा:
पितरों की मुक्ति के लिए यह समय विशेष है। कार्तिक माह में दीपदान द्वारा पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान की जाती है, जिससे संपूर्ण कुल का कल्याण होता है। दीप अर्पण से हम अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं और अपने जीवन को धर्म की राह पर बढ़ाते हैं।
दोहा:
पितृगण भी हैं तरते, जब दीप करे अर्पण।
केशव कृपा से सबका, हो जाता उद्धार॥

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