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भगवद् गीता: तृतीय अध्याय – कर्म योग

भगवद् गीता: तृतीय अध्याय – कर्म योग

तृतीय अध्याय को “कर्म योग” कहा जाता है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का महत्व बताते हैं और सिखाते हैं कि हर मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। केवल ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है; कर्म करते हुए निष्काम भाव से अपने कार्य में रत रहना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है। कर्म योग का यह सिद्धांत हमें बताता है कि बिना फल की इच्छा के कर्म करना ही सच्चा योग है।

श्लोक 8:

**नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥8॥

अनुवाद:
श्रीकृष्ण कहते हैं: “तुम अपने नियत (निर्धारित) कर्म को करो, क्योंकि कर्म न करने की तुलना में कर्म करना श्रेष्ठ है। यदि तुम कर्म नहीं करोगे, तो तुम्हारे शरीर का पालन-पोषण भी नहीं हो सकेगा।”

भावार्थ:

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि संसार में कर्म करना अनिवार्य है। कर्म का त्याग करके मनुष्य शांति प्राप्त नहीं कर सकता। यदि हम केवल अकर्मण्य होकर बैठ जाते हैं, तो हमारे शरीर का भी पोषण नहीं हो सकेगा। इसलिए, हमें बिना फल की इच्छा के अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

दोहा:

“कर्म ही जीवन का धर्म, फल की इच्छा त्याग।
निष्काम भाव से जो चले, वही सच्चा योग॥”

इस दोहे में कर्म की महत्ता और फल की इच्छा का त्याग करने का संदेश दिया गया है। निष्काम भाव से कर्म करना ही सच्चे योग की पहचान है।

शिक्षाप्रद कहानी: राजा जनक का कर्मयोग

राजा जनक, विदेह राज्य के राजा, योगी और ज्ञानी थे। उनके राज्य में एक संत आए और उन्होंने राजा जनक को प्रश्न किया, “हे राजन! आप राजा होकर इतने विशाल राज्य का प्रबंधन करते हैं, फिर भी आप योगी कहलाते हैं। यह कैसे संभव है?”

राजा जनक ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे महात्मन! मैं अपने कर्तव्यों का पालन करता हूँ, परंतु मन से सभी बंधनों से मुक्त हूँ। मैं कर्म करता हूँ, परंतु कर्म के परिणाम से जुड़ा नहीं हूँ।”

संत ने राजा जनक की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने जनक के राजमहल में आग लगा दी। सभी राजकर्मी भयभीत हो गए, लेकिन राजा जनक ध्यानमग्न रहे। जब संत ने यह देखा, तो उन्होंने पूछा, “राजन! आपका महल जल रहा है, फिर भी आप चिंतित नहीं हो?”

राजा जनक ने कहा, “यह महल मेरा नहीं है। मैं तो अपने कर्तव्य का पालन करता हूँ, परंतु इससे बंधा नहीं हूँ। यदि यह जल जाए, तो भी मेरे कर्तव्य में कोई अंतर नहीं आएगा। मेरा मन तो निष्काम कर्म में रत है।”

संत यह सुनकर बहुत प्रभावित हुए और समझ गए कि सच्चा कर्मयोगी वही है जो कर्म करता है, लेकिन उससे जुड़ता नहीं।

शिक्षा:
राजा जनक की यह कथा हमें सिखाती है कि हमें अपने कर्म का पालन करना चाहिए, लेकिन फल की इच्छा और मोह से मुक्त रहना चाहिए। यही सच्चा कर्म योग है।

महत्त्व:

इस अध्याय में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्मानुसार कर्म करना चाहिए। कर्म से संसार का चक्र चलता है। यदि हम कर्म नहीं करेंगे, तो यह चक्र रुक जाएगा और संसार में अव्यवस्था फैल जाएगी। इसलिए, कर्म करना हर व्यक्ति का धर्म है।

श्रीकृष्ण यह भी सिखाते हैं कि केवल कर्म का त्याग करना सही नहीं है, बल्कि हमें कर्म करते हुए मोह और फल की इच्छा का त्याग करना चाहिए। यही निष्काम कर्म योग का मार्ग है, जो जीवन में सच्ची शांति और मुक्ति की ओर ले जाता है।

अतः तृतीय अध्याय हमें कर्म, कर्तव्य, और निष्कामता के बीच का संतुलन सिखाता है।

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