Press "Enter" to skip to content

श्रीमती राधा रानी का प्रातःकालीन चरित्र | दिव्य शृंगार, शुद्धता और भक्ति का मधुर चित्रण

प्रातः की शीतल बेला में,
जब नभ पर अरुणिमा मुस्काए,
व्रज की कुंज-गलियों में
मधुर पवन धीरे-धीरे गाए।

कमल-नयनी राधिका तब,
निज अंतर में श्याम बसाए,
हर श्वास-स्पंदन में केवल
प्रियतम का नाम समाए।

स्नान पश्चात् उज्ज्वल तन पर,
पवित्र वस्त्र जब धरती हैं,
लज्जा, शील, सौम्यता मानो
मूर्तिमान हो उतरती हैं।

केशों में जब पुष्प पिरोतीं,
चंपा, केतकी, मोगरा,
उनकी सुगंध से पुलकित हो उठे
वन, उपवन, कुंज, सारा व्रज-घरा।

नूपुर मौन हैं, कंगन शांत,
फिर भी रस की झंकार बजे,
क्योंकि राधा के प्रत्येक भाव में
प्रेम-संगीत अनायास सजे।

दर्पण में जब देख निहारें,
स्वयं को नहीं, श्याम को देखें,
“यह रूप नहीं मेरा,” कहकर
निज सौंदर्य भी उन्हें सौंप दें।

सखियाँ पास खड़ी मुसकातीं,
नेत्रों में छलके आनंद,
कहती हैं—“आज श्यामसुंदर
अवश्य होंगे अति प्रसन्न।”

राधा हँसकर मौन साध लें,
नेत्र झुकाकर प्रेम लजाएँ,
मन ही मन में यही प्रार्थना—
“हे प्रिय! आज चरणों में स्थान पाएँ।”

यह नहीं कोई नित्य-क्रिया,
यह तो प्रेम का नित्य विधान,
जहाँ हर कर्म पूजा बन जाए,
हर श्वास बने आराधन।

राधा का यह प्रातः-चरित,
साधक के पथ की ज्योति बने,
सिखलाए—जीवन तब पावन हो,
जब हर क्षण श्याम को अर्पित हो।

Comments are closed.

You cannot copy content of this page