🚩 अद्भुत पौराणिक प्रसंग: क्यों राजा जनक डरते थे अयोध्या के वासियों से? 🚩
आदरणीय सज्जनों !
हम सभी जानते हैं कि माता सीता के स्वयंवर में राजा जनक ने अयोध्या नरेश दशरथ को निमंत्रण नहीं भेजा था। लेकिन क्यों? इसके पीछे एक बेहद रोचक और रहस्यमयी कथा छिपी है, जो अयोध्या की एक साधारण सफाई करने वाली महिला के सतीत्व और शक्ति को दर्शाती है।
गौ-शाप और नेत्रहीन पति: –
राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति, ससुराल जाते समय, दलदल में फंसी एक गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। गाय ने दम तोड़ते हुए शाप दिया कि वह जिसे देखने जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा। ससुराल पहुँचते ही वह अंधा हो गया।
शाप मुक्ति का कठिन उपाय:
राजा जनक के दरबार में विद्वानों ने उपाय बताया: “यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी में गंगाजल भरकर लाए और उस जल के छींटे इस व्यक्ति की आंखों पर मारे, तो इसकी रोशनी लौट सकती है।”
जनकपुर में ऐसी स्त्री न मिलने पर, राजा जनक ने अन्य राज्यों में संदेश भेजा।
अयोध्या की शक्ति:
जब यह संदेश अयोध्या पहुंचा, तो राजा दशरथ ने गर्व से कहा, “मेरे राज्य में महलों की रानियाँ तो क्या, एक साधारण सफाई करने वाली भी पूर्ण पतिव्रता है।” उन्होंने एक सफाई कर्मचारी महिला को जनकपुर भेजा।
चमत्कार:
वह महिला गंगा किनारे गई और प्रार्थना की। उसके सतीत्व का प्रभाव ऐसा था कि छलनी में भरा हुआ गंगाजल एक बूंद भी नीचे नहीं गिरा! उसने दरबार में आकर उस व्यक्ति की आंखों पर छींटे मारे और उसे दृष्टि मिल गई।
राजा जनक का भय: –
जब राजा जनक को पता चला कि यह महिला अयोध्या की एक साधारण सफाई कर्मचारी है, तो वे स्तब्ध रह गए। उन्होंने सोचा:
“जिस राज्य की एक साधारण दासी इतनी शक्तिशाली और पतिव्रता है, वहां के राजकुमार कितने तेजस्वी होंगे? यदि स्वयंवर में अयोध्या से कोई सामान्य व्यक्ति भी आ गया, तो वह आसानी से शिव धनुष तोड़ देगा और राजकुमारी सीता का विवाह किसी निम्न कुल में हो सकता है।”
इसी भय और असमंजस के कारण उन्होंने दशरथ जी को निमंत्रण नहीं भेजा। लेकिन विधि का विधान देखिए, विश्वामित्र जी के साथ राम-लक्ष्मण वहां पहुंचे और राम जी ने धनुष तोड़कर सीता जी को वरण किया।
सीख: शक्ति पद या प्रतिष्ठा में नहीं, चरित्र और पवित्रता में होती है।
🙏।। जय श्री राम ।। ।। जय मिथिला ।।🙏

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