श्रीराधाके प्रेमोद्गार — श्रीकृष्णके प्रति
हे प्रियतम! तुम जंत्र के चालक हौ, मैं जंत्र हूँ; मैं काठ की पूतरी हूँ, तुम सूत्रधार-पूतरी कूँ नचायबेवारे हौ।
तुम अपनी इच्छा के अनुकूल मोते क्रिया करवायौ तथा बुलवायौ एवं अपने इसारे पै नचायौ करौ हौ।
मैं तुम्हारे आधीन हूँ कै सदा क्रिया करती, बोलती तथा नाचती रहूँ हूँ; मेरे भीतर कोई अहंकार-मैपनौ नायँ।
मेरौ मन सर्वथा मौन-क्रियाहीन हैगयौ है—नायँ-नायँ, मेरे मन की अलग सत्ताई नायँ रही—तुम्हारी मन ही मेरौ मन बनिरहयौ है।
मैं तौ अचिंत्य (काहू की धारणा में नायँ आवै, ऐसौ) खिलौना हूँ, तुमही वाकूँ खिलायबेवारे हौ।

मोकूँ कहा करनौ चाहिये और कहा नहीं करनौ चाहिये, यापै मैं कैसैं कछू बिचार करूँ।
तुम ही स्वयं सोचि कैं, जासौँ तुम कूँ सुख होय, ऐसौ तुम कूँ प्यारी लगिबेवारौ बिहार—तुम्हारी रुचि कौ खेल तुम स्वच्छंदता ते (काऊ तरह कौ संकोच न करि कैं) नित्य करते रहौ।
मैं तौ सदा अनबोल-बोलिबे में असमर्थ, क्रियाहीन, चेष्टासून्य (हिलिबे-डोलिबे में हूँ असक्त) तथा बिकाररहित (प्रतिक्रियासून्य) हूँ।
तुम जा खन जो कछू करनौ चाहौ, सोई सदाँ करयौ करौ—मेरी आड़ी सूँ कोई सर्त अथवा करार नायँ है। मेरे ताईं मरिबौ-जीबौ कैसौ और मान-अपमानहू कछू अर्थ नायँ राखै।
हे प्रियतम! ये सगरे तुम्हारेई महान् सुखमय नित्य के खेल हैं। तुमने अपने हाथ कौ खिलौना बनाय कैं मोकूँ अत्यंत निहाल करि दीनौ है। येऊ मैं कैसैं मानूँ अथवा जानूँ।
अपनी हाल चाल तुम ही जानौ (कारण, तुम ही सब कछू करौ-कराऔ हौ)।
इतनी बात जो मैं कहि गई, सोऊ तुम जानौ हौ कि कौन कहि रौ है। साँची बात तौ ये है कि मोमें सुर भरि कैं तुम ही मुखरा-जैसे बने बोले हौ। मैं तो बाचालता ते सून्य, मौन हूँ।
༺꧁Զเधॆ Զเधॆ꧂༻
꧁♥️ हरे कृष्ण♥️꧂
🦚जय श्री कृष्ण🦚

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