🌸 श्री राधा–कृष्ण चरित्र
गहवर वन : विरह का साक्षी वन
गहवर वन…
बरसाने का वही गहवर वन—
जहाँ युगलवर के प्रेम-मिलन की स्मृतियाँ आज भी श्वास लेती हैं।
यहाँ के वृक्ष, लताएँ, मोर और समस्त पक्षी—
सब साक्षी हैं…
राधा–श्याम के अनन्त प्रेम के।
“मैं रंगदेवी हूँ…”
मैं—
श्रीराधारानी की प्रिय सखी रंगदेवी।
मेरे पिता सारंग गोप—
सरल, सहज, निष्कपट स्वभाव के।
भानु बाबा से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी।
मेरी मैया—करुणा—
कीर्तिमैया की बाल-सखी।
मायका एक, बचपन एक,
और विवाह भी एक ही गाँव—बरसाना।
कहते हैं—
मेरा जन्म भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था।
उस दिन समूचा बरसाना नाचा था…
और कीर्तिमैया?
वे तो आनंद में थिरक उठी थीं।
मैं अकेली नहीं जन्मी थी—
हम जुड़वाँ बहनें थीं।
मेरी छोटी बहन—सुदेवी।
हम दोनों का जीवन—
श्रीजी की सेवा में अर्पित हो गया।
ना कोई कामना…
ना कोई इच्छा…
विवाह?
उसका विचार भी कभी मन में नहीं आया।
हमारी एकमात्र साधना यही थी—
राधा और श्याम का मिलन।
युगलवर प्रसन्न रहें—
बस यही वर हमने विधाता से माँगा था।
पर…
विधाता भी कितना कठोर हो गया था
मेरी लाडिली के लिए।
🌿 विरह का समाचार
कल ललिता सखी ने जो कहा—
वह वाक्य अब भी हृदय चीर देता है—
“श्यामसुंदर…
मथुरा भी छोड़ गए हैं।”
और जाते-जाते कह गईं—
“स्वामिनी को मत बताना।”
पर मैं कैसे सहूँ यह सब?
कैसे सँभालूँ अपनी श्रीजी को?
आज उन्हें गहवर वन ले आई थी।
सोचा था—
थोड़ा भ्रमण होगा,
तो मन को शांति मिलेगी।
पर…
यहाँ तो विरह और गाढ़ा हो गया।
यहीं तो मिलते थे वे…
यहीं… इसी वन में।
🕊️ वन का प्रश्न
वन के पक्षी एकाएक बोल उठे—
“कहाँ है श्याम?”
“कहाँ है श्याम?”
मैंने संकेत किया—
“चुप रहो…”
पर वे कैसे मानते?
श्रीराधा जड़वत् खड़ी रह गईं।
चारों ओर दृष्टि दौड़ाई—
वृक्ष…
सरोवर…
खिले कमल…
लताएँ…
और फिर—
“हे गहवर वन के वृक्षों!
क्या तुम्हें विरह नहीं व्यापता?
क्या तुम्हें मेरे श्याम की स्मृति नहीं आती?”
“वे तुम्हें छूते थे…
क्या उनकी स्पर्श-स्मृति भूल गए?”
“लताओं!
तुम इतनी हरी कैसे हो?
तुम मुरझाई क्यों नहीं?”
इतना कहते-कहते—
हा श्याम! हा प्राणेश!
और मेरी स्वामिनी—
मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं।
🌙 रात्रि का भय
कुछ समय बाद—
वे चेतना में आईं।
“रंगदेवी!
तुम कहाँ हो?
मैं अकेली क्यों हूँ?”
“मुझे रात्रि से डर लगता है…
रात्रि में मेरा उन्माद बढ़ जाता है…”
मैंने उनका हाथ थामा।
वे बोलीं—
“सुनो…
मेरे श्याम कुछ कह रहे हैं…”
“वे कहते हैं—
राधे!
बहुत दिनों से वीणा नहीं सुनी…”
“रंगदेवी!
प्रिय की आज्ञा न मानना अपराध है।”
“जाओ…
मेरी वीणा ले आओ।”
“आज गहवर वन में
रात भर वीणा बजेगी—
मेरे श्याम के लिए।”
🎶 वीणा और चन्द्रमा
मैं महल से वीणा ले आई।
गहवर वन…
घना…
मध्य में सरोवर…
पूर्णिमा का चन्द्रमा—
मानो स्वयं श्रोतृ बनकर उतरा हो।
जैसे ही श्रीजी ने तार छेड़े—
लताएँ झूम उठीं।
ऐसा राग—
कि हृदय विदीर्ण हो जाए।
अश्रु बहते रहे…
कंचुकीपट भीग गया।
मोर मौन हो गए।
पक्षी निस्तब्ध।
और तभी—
वीणा रुक गई।
श्रीजी ने
अपने विशाल नेत्र
चन्द्रमा की ओर उठाए…
🌙 रंगदेवी का प्रश्न
“हे स्वामिनी…
वीणा क्यों रोक दी?”
मैंने प्रार्थना की—
“बजाइये न…”
क्रमशः…
(अगले भाग में—
चन्द्रमा से संवाद,
विप्रलम्भ की पराकाष्ठा,
और अदृश्य श्याम की उपस्थिति…)
🌸
जय जय श्री राधे कृष्ण
जय जय श्री राधे

Comments are closed.