🌸 भाव की विजय — बाँके बिहारी की लीला 🌸
एक कन्या थी—
सीधी, सरल और निष्कपट।
बचपन से ही उसके हृदय में केवल एक नाम बसा था—
श्याम… श्याम… श्याम…
खेल में कृष्ण,
रोने में कृष्ण,
सोने से पहले कृष्ण,
और जागने पर भी कृष्ण।
भक्ति करते-करते वह बड़ी हुई
और ठाकुर जी की कृपा से उसका विवाह भी
श्रीधाम वृंदावन में एक अच्छे परिवार में हो गया।
पहली बार ससुराल आई,
पर नई दुल्हन होने के कारण
वृंदावन की गलियों में न घूम सकी
और फिर मायके चली गई।
कुछ समय बाद पति उसे लेने आया।
दोनों जब वृंदावन पहुँचे तो
संध्या हो चुकी थी।
यमुना तट पर रुककर पति बोला—
“तुम यहीं बैठो,
मैं यमुना स्नान करके अभी आता हूँ।”
वह पेड़ के नीचे बैठ गई—
घूँघट लंबा था,
मन में भक्ति उमड़ रही थी।
विचार आया—
“मैं वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूँ,
पर उनसे कोई निज सम्बन्ध नहीं जोड़ा।”
सोचा—
“ठाकुर जी तो मेरे पति से छोटे हैं,
तो आज से वे मेरे देवर हुए
और मैं उनकी भाभी।”
इतना सोचते ही—
एक बालक आया
और बोला—
“भाभी… भाभी…”
वह चौंक गई।
घूँघट न उठाया,
संकोच में बैठी रही।
बालक ने जिद की,
घूँघट उठाया,
चेहरा देखा
और मुस्कुराकर भाग गया।
पति आया,
सब सुना।
बोला—
“मिल गया तो छोड़ूँगा नहीं।”
कुछ दिन बाद सास ने कहा—
“बहू को बाँके बिहारी के दर्शन करा लाओ।”
दूसरे दिन दोनों मंदिर पहुँचे।
भीड़ थी,
पति पीछे रह गया।
काफी देर बाद बोला—
“अरी! बिहारी जी सामने हैं,
घूँघट खोलकर दर्शन तो कर।”
उसने जैसे ही घूँघट उठाया—
तो बाँके बिहारी की जगह वही बालक
मुस्कुराता हुआ दिखाई दिया…!
वह चिल्लाई—
“वो… वही है…!”
पति दौड़ा आया,
देखा…
और अवाक रह गया।
वहीं मंदिर में
अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा—
बोला—
“मैं वर्षों से वृंदावन में हूँ,
मुझे आज तक दर्शन नहीं हुए…
और तेरा भाव इतना शुद्ध है
कि बिहारी जी स्वयं बालक बनकर
तेरे सामने आए।”
🌺 भावार्थ (रस-सार) 🌺
👉 भगवान को भाव चाहिए,
परिचय नहीं।
👉 सम्बन्ध नाम से नहीं,
हृदय से जुड़ता है।
👉 जहाँ भाव शुद्ध होता है,
वहाँ भगवान मूर्ति नहीं रहते — लीला बन जाते हैं।
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