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प्रथमः स्कंध श्रीमद्भागवत (अधिकारी)

प्रथमः स्कंध (अधिकारी)


श्रीमद्भागवत में 12स्कन्ध 335 अध्याय और 18000श्लोक हैं |


तेनेयम् वाड़मयि मूर्तिः प्रत्यक्षः कृष्णएवहि |


यह साक्षात भगवान श्रीहरि का स्वरुप है उनकी शब्द मई मूर्ति है कौशिकी संहिता में कहा गया है |


पादौ तु प्रथमःस्कन्धः द्वितीयो जानुनीश्रुतः |
तृतीयः संस्थनी ज्ञेय चतुर्थः कटि रुच्यते ||
नाभिं तु पञ्चमं विद्यात ह्रदयं षष्ठं ईरितं |
सप्तमस्तु उरः प्रोक्तं अष्टमःकंण्ठ रुच्यते ||
स्कन्धस्तु नवमःस्कन्धःदशमो मुखभीरितं |
कर्णाक्षं नासिका युक्तं सर्वार्थ परिपूरितं ||
एकादसस्तुत्रमागं द्वादशं ब्रह्मस्ध्रकम् |
एवं भागवतं शास्त्रं विष्णुमूर्तिप्रकीर्तितम् ||

प्रथमस्कंध भगवान श्री हरि के चरण हैं दूसरा घुटने हैं तीसरा जंघा चौथा कमर है पांचवास्कंध नाभि छठवां ह्रदय सातवा छाती आठवां कंठ नौवां कंधा 10वां का न आंख नासिका से युक्त संपूर्ण मुख्यमंडल 11 वां मस्तक और बारहवांस्कंध ब्रह्म रंध्र इस प्रकार यह संपूर्ण भागवत भगवान का ही स्वरुप है इस भागवत का मंगलाचरण अत्यंत विलक्षण है।

ब्रह्म सूत्र का पहला सूत्र– जन्माद्यस्य यतः, है वेदांत का प्रारंभ अथ इस शब्द से होता है तात्पर्य यह है इस जगत में जिसका भी जन्म हुआ है वह सभी इस भागवत के सुनने के अधिकारी हैं।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय


जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरय: ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 1.1.1॥


ॐ — हे मम प्रभु; नमः — नमो नमः; भगवते — भगवते पुरुषाय; वासुदेवाय — वासुदेवाय (वासुदेवपुत्राय) श्रीकृष्णाय वा आदिमेश्वराय;
जन्म-आदि — सृष्टि, पोषण, नाश; अस्य — प्रकटितब्रह्माण्डानां; यतः — यस्मात्; अनवायत् — प्रत्यक्ष; इतरतः — अप्रत्यक्ष; का — च; अर्थेषु — प्रयोजनानि; अभिज्ञाः — पूर्णतया ज्ञाता; स्व-राट् — पूर्णतया स्वतन्त्रः; तेने — प्रदत्त; ब्रह्म — वैदिक ज्ञान; hṛdā — हृदयस्य चेतना; यः — one who; आदि-कवाये — आदिसृष्टे जीवे; मुह्यन्ति — भ्रमिताः भवन्ति; यत् — यस्य विषये; सूरायः — महान् ऋषयः देवाः च; तेजः — अग्निः; वारि — जलम्; मृदम् — पृथिवी; यथा — यथा; विनिमायः — कर्म प्रतिक्रिया च; यात्रा — जिस पर; त्रि-सर्गः — त्रयः सृष्टिगुणाः, सृजनात्मकाः शक्तिः; अमृषः — प्रायः तथ्यात्मकः; धामना — सर्वैः पारमार्थिकसामग्रीभिः सह; स्वेना — स्वयम्; सदा — सदा; निरस्त — अभावेन नकारः; कुहकं — भ्रम; सत्यम् — सत्यम्; परम् ​​— निरपेक्ष; धीमहि — अहं ध्यायामि एव ।

जिससे इस जगत की उत्पत्ति पालन और संघार होता है | जो शत पदार्थों में अनुगत हैं और असद पदार्थों से पृथक हैं सर्वज्ञ है स्वयंप्रकाश है जिन्होंने सृष्टि के आदि में आदिकवि ब्रह्मा जी को संकल्प मात्र से ब्रह्मा जी को वेद का ज्ञान प्राप्त किया जिसके विषय में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। जैसे तेज में जल का जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है उसी प्रकार यह त्रिगुण मई जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति रूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी सत्य प्रतीत हो रही है जो अपने स्वयं प्रकाश से माया एवं माया के कार्य से सर्वथा मुक्त हैं ऐसे सत्यस्वरूप भगवान का हम ध्यान करते हैं।

धर्म: प्रोज्हितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सरणं सततं
वेद्यं वास्तवमात्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः
सद्यो हृदयवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः सुश्रुषाभिस्तत्क्षणात् ॥ 1.1.2॥


धर्मः – धार्मिकता; प्रोज्जहिता – पूर्णतया अस्वीकृत; कैतवः – सकाम इरादे से आच्छादित; अत्र – यहाँ; परमाः – सर्वोच्च; निर्मित्सरानाम् – शत-प्रतिशत शुद्ध हृदय वाले का; सताम् – भक्त; वेद्यम् – समझने योग्य; वास्तवम् – तथ्यात्मक; अत्र – यहाँ; वास्तु – पदार्थ; शिवदम् – कल्याण; तप – त्रय – तीन गुना दुःख; उन्मूलानाम् – उखाड़ने वाला; श्रीमत – सुन्दर; भगवते – दभागवत पुराण ; महा – मुनि – महान ऋषि (व्यासदेव); कृते – संकलित करके; किम् – क्या है; वा – आवश्यकता; परैः – अन्य; ईश्वरः – परम भगवान; सद्यः – तुरन्त; हृदि – हृदय के भीतर; अवरुध्यते – सघन हो जाता है; अत्र – यहाँ; कृतिभिः – पवित्र पुरुषों द्वारा; शुश्रुषुभिः – संस्कृति द्वारा; तत् – क्षणात् – बिना देर किये ।

इस श्रीमद्भागवत का विषय क्या है | धर्मः प्रोज्झितकैतवः इसमें कपट रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है यही भागवत का विषय है भागवत के अधिकारी कौन है |

निरर्मत्सराणां मत्सरता से रहित सत्पुरुष ही इसके अधिकारी हैं श्रीधर स्वामी जी कहते हैं—— परोत्कर्षा सहनं न इति मत्सरः| जो दूसरे का उत्कर्ष को सह नहीं सकता उसे ही मत्सर कहते हैं | ऐसे मत्सर से रहित सत्पुरुष ही भागवत की अधिकारी हैं |


कंचन तजना सहज है ,सहज त्रिया का नेह |
मान ,बड़ाई, ईरखा (ईर्ष्या का प्राकृत रूप )तीनों दुर्लभ येह।


महाकवि तुलसीदास इस दोहे में कहतें हैं कि जब तक तुम्हारे मन में किसी के भी प्रति ईर्ष्या भाव है ,तुम आत्मश्लाघा (आत्म प्रशंशा )से ग्रस्त हो ,सब जगह मान चाहते हो ,सब जगह मी फस्ट भाव लिए हो तुम्हारा अहंकार शिखर छू रहा है तब तक तुम्हें ईश्वर के दर्शन नहीं होंगें। इन्हें तजना सहज नहीं है |


तापत्रयोन्मूलनम् आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक इन तीन प्रकार के पापों का नाश करना ही भागवत का प्रयोजन है इसका संबंध क्या है ? इस भागवत की श्रवण करने की इच्छा मात्र से भगवान श्रीहरि हृदय में आकर बंदी बन जाते हैं यही भागवत का संबंध है ऐसे महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा रचित श्रीमद्भागवत के रहते हुए अन्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन |

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमलयं मुहुरहो रसिका भुवि मनोदिः ॥ 
1.1.3

निगम – वैदिक साहित्य; कल्प – तरोः – इच्छा वृक्ष; गलितम् – पूर्णतः परिपक्व; फलम् – फल; शुक – श्रीमद्भागवत के मूल वक्ता श्रील शुकदेव गोस्वामी; मुखात् – मुख से; अमृत ​​- अमृत; द्रव – अर्धठोस और नरम और इसलिए आसानी से निगलने योग्य; संयुतम – सभी प्रकार से उत्तम; पिबता – इसका आस्वादन करो; भागवत – भगवान के साथ शाश्वत संबंध के विज्ञान से संबंधित पुस्तक; रसम् – रस (जो आनंद लेने योग्य हो); आलयम- मुक्ति तक, या मुक्त स्थिति में भी; मुहुः – सदैव; अहो – हे; रसिकाः – जो मधुर संगीत के ज्ञान से परिपूर्ण हैं; भुवि – पृथ्वी पर; भावुकाः – विशेषज्ञ और विचारशील।

यह वेद रूपी वृक्ष का पूर्ण परिपक्व फल है शुकदेव रूपी तोते के मुंह का स्पर्श हो जाने के कारण यह अमृत द्रव से युक्त है जिसमे छिलका गुठली आदि बिल्कुल भी नहीं है इसलिए हे रसिको ,हे भावुको जब तक जीवन है तब तक बारंबार इस भागवत रस का पान करो क्योंकि

बोलिए राधे राधे

कथाप्रारम्भ

नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषय: शौनकादाय:।
सत्रं स्वर्गायलोकाय सहस्रसमामासत् ॥ 1.1.4 ॥


नैमिषे – नैमिषारण्य नामक वन में; अनिमेष – क्षेत्रे – वह स्थान जो विशेष रूप से विष्णु का पसंदीदा है (जो अपनी पलकें बंद नहीं करता); ऋषियः – ऋषियों; शौनक – अद्यः – शौनक ऋषि के नेतृत्व में; सत्रम् – बलिदान; स्वर्गाय – भगवान जो स्वर्ग में महिमामंडित हैं; लोकाय – और उन भक्तों के लिए जो सदैव भगवान के संपर्क में रहते हैं; सहस्र – एक हजार; समम् – वर्ष; असात् – किया गया ।

नैमिषारण्य क्षेत्र, जहां देवता और ऋषि-मुनियों की साधना के परम पवित्र स्थल हैं, वहाँ एक बार भगवान विष्णु और देवताओं की कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से, शौनकादि ऋषियों ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। यह यज्ञ, जो सहस्र वर्षों तक चलने वाला था, उनके जीवन का एकमात्र साध्य था—भगवत्प्राप्ति।


साक्षात् देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त इस भूमि पर, प्रकृति की गूंज में परम शांति थी। उस प्रातःकाल, जब सूर्य की किरणें धरती को स्वर्णिम आभा से नहलाने लगीं, शौनक और उनके साथ सभी मुनि अपने नित्यकर्मों से निवृत्त होकर यज्ञ की पवित्र अग्नि में आहुति अर्पित कर चुके थे। हर एक हृदय में केवल एक ही भावना थी—आध्यात्मिक उत्कंठा, ईश्वर के दर्शन की तीव्र इच्छा।


सभी ऋषि-मुनि एकत्र हुए और सहर्ष, अपने हृदय के पूर्ण आदर और श्रद्धा के साथ सूतजी का पूजन करने लगे। उनके मुखमंडल पर ज्ञान की उज्ज्वलता झलक रही थी। उन्हें ऊँचे आसन पर बैठाकर, मुनियों ने अपने हृदय की गहराइयों से एक ही प्रश्न किया, जिसका उत्तर मानो पूरे यज्ञ की सफलता का द्वार खोल सकता था।


“हे सूतजी! हमें भगवत्प्राप्ति का मार्ग बताएं, जिससे हमारे हृदय में जो साधना की अग्नि धधक रही है, वह भगवान विष्णु के दर्शन से शांत हो सके।”


ऋषियों की यह विनती, आकाश में गूंजती प्रतीत हो रही थी, जैसे समस्त सृष्टि भी उनके प्रश्न का उत्तर सुनने को आतुर हो।
शौनक आदि ऋषियों के प्रश्न


पहला प्रश्न – मनुष्यों के एकमात्र कल्याण का परम कारण क्या है ?
दूसरा प्रश्न – शास्त्र बहुत से हैं उनमें अनेकों प्रकार के कर्मों का वर्णन किया गया है मनुष्य को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ?
तीसरा प्रश्न- भगवान श्री कृष्ण देवकी और वसुदेव के यहां क्या करने की इच्छा से उत्तीर्ण हुए थे?


चौथा प्रश्न- भगवान के उदार चरित्र जिसका गान बड़े-बड़े विद्वान करते हैं आप भगवान की लीलाओं का वर्णन कीजिए।


पाँचवाँ प्रश्न- भगवान श्रीहरि के प्रमुख कितने अवतार हुए हैं ?
अन्तिम प्रश्न- जब भगवान श्री हरि भगवान श्री कृष्ण चंद्र अपने धाम में चले गए तब—- धर्मं कं शरणं गतः
धर्म किसकी शरण में गया सौनकादि ऋषि के इस प्रकार प्रश्न पूछने पर सूतजीने अपने गुरुदेव श्री शुकदेव जी का मंगलाचरण करते हैं |

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं  द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव I
पुत्रेति तन्मयतया तरवोsभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोsस्मि II२II
( मा.1,2 )

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् |
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जय मुदीरयेत् ||
1.2.4

जब उग्रश्रवा सूतजी ने यह प्रश्न सुना, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “ऋषियों! आपने सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिए यह अद्भुत कार्य किया है। यह प्रश्न भगवान श्रीकृष्ण के बारे में है, जो आत्मशुद्धि का उत्तम साधन है।”

पहला प्रश्न – मनुष्यों के एकमात्र कल्याण का परम कारण क्या है ?

वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥ 
1.2.7


मनुष्यों के लिए सर्वोत्तम कल्याण का परम कर्म वह है, जिससे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है—भक्ति ऐसी, जिसमें किसी भी प्रकार की कामना न हो। जब यह भक्ति नित्य और निरंतर बनी रहती है, तो हृदय आनंदस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। इस अनुभव से व्यक्ति कृतकृत्य हो जाता है, क्योंकि वह सच्चे प्रेम और समर्पण के साथ भगवान के निकट पहुँचता है।


प्रेम मे ना हो वासना तो वरदान बन जाए |
भक्तमें ना हो कामना तो भगवान बन जाए ||

दूसरा प्रश्न – शास्त्र बहुत से हैं उनमें अनेकों प्रकार के कर्मों का वर्णन किया गया है मनुष्य को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए ?

तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पति: ।
श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्च ध्येय: पूज्यश्च नित्यदा ॥
1.2.14


तस्मात् – अत:; एकेना – एक द्वारा; मनसा – मन का ध्यान; भगवान – भगवान का व्यक्तित्व; सात्वतम – भक्तों का; पतिः – रक्षक; श्रोतव्यः – सुनना है; कीर्तितव्यः – महिमामंडित होना; सीए – और; ध्येयः – स्मरणीय; पूज्यः – पूजनीय; सीए – और; नित्यदा – लगातार ।

 भक्तवत्सल भगवान के चरणों की आराधना, उनके यश का निरंतर श्रवण, कीर्तन और ध्यान ही एकाग्र मन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। संसार के कर्मों की गाँठ बहुत कठिन और उलझी हुई होती है, लेकिन जो विचारशील पुरुष भगवान के चिन्तन की तलवार से उस गाँठ को काट डालते हैं, वे मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो जाते हैं।


सोचिए, ऐसा कौन होगा, जिसका हृदय भगवान की दिव्य लीलाओं और उनकी प्रेममयी कथा में डूबने को व्याकुल न हो? जब भगवान श्रीकृष्ण के यश का श्रवण और कीर्तन होता है, तो वह केवल पवित्रता ही नहीं देता, बल्कि आत्मा के सभी अशुभ संस्कारों और वासनाओं को भी निर्मूल कर देता है। जैसे कोई प्रेममयी माँ अपने बच्चे की चिंता में सब कुछ भूल जाती है, वैसे ही भगवान अपने भक्तों की अशुद्धियों को अपने प्रेम से नष्ट कर देते हैं।


भगवान श्रीकृष्ण, जो संतों के नित्य सुहृद हैं, वे अपनी कथा सुननेवालों के हृदय में स्वयं निवास कर लेते हैं। उनका यश और कीर्तन केवल शब्द नहीं, बल्कि हृदय की गहराइयों तक पहुँचने वाली अमृतधारा है। जो भी उनकी कथा सुनता है, वह स्वतः ही उनके प्रेम में बंध जाता है। यह कथा हृदय को शुद्ध करती है, आत्मा को पवित्र करती है और जीवन को सत्य के प्रकाश से भर देती है।


क्या यह संसार के किसी अन्य सुख से बढ़कर नहीं है? भगवान की कथा ही वह अमृत है, जो जीवन के प्रत्येक दु:ख और क्लेश का समाधान है।

बड़े भाग मानुष तनु पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।
मानव शरीर के लिए तो देवता भी तरसते हैं, उनकी अभिलाषा रहती है कि यदि मानव शरीर मिल जाता तो हम भी समुचित साधनों के द्वारा जन्म–मरण के बंधन को काट मोक्ष प्राप्त करने का उपक्रम कर पाते। देवयोनि तो भोग योनि है और अपने  सत्कर्मों का सुख फल भोग कर पुनः देवों को स्वर्ग के इतर लोकों में गिरकर अन्यान्य योनियों में भटकना पड़ता है।  एकमात्र मनुष्य तन के द्वारा ही कर्म करके हम कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं।

तीसरा प्रश्न- भगवान श्री कृष्ण देवकी और वसुदेव के यहां क्या करने की इच्छा से उत्तीर्ण हुए थे?

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखा: ।
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपरा: क्रिया: ॥
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तप: ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गति: ॥
1.2.28-29


श्लोक का अर्थ:
वासुदेवपरा वेदा: सभी वेद वासुदेव (भगवान श्रीकृष्ण) पर निर्भर हैं।
वासुदेवपरा मखा: सभी यज्ञ वासुदेव को समर्पित हैं।
वासुदेवपरा योगा: सभी योग वासुदेव को प्राप्त करने के लिए हैं।
वासुदेवपरा क्रिया: सभी क्रियाएँ वासुदेव की सेवा में हैं।
वासुदेवपरं ज्ञानं: सच्चा ज्ञान वासुदेव के ज्ञान के प्रति समर्पित है।
वासुदेवपरं तप: तपस्या का उद्देश्य भी वासुदेव की कृपा प्राप्त करना है।
वासुदेवपरो धर्मो: सभी धर्म वासुदेव के मार्ग का अनुसरण करते हैं।
वासुदेवपरा गति: सभी जीवों की अंतिम गति वासुदेव की शरण में है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें बताता है कि जीवन का हर पहलू, चाहे वह धार्मिक, आध्यात्मिक या सांस्कृतिक हो, वासुदेव की ओर ही अग्रसर है।
वेदों का सार भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। यज्ञों का उद्देश्य भी श्रीकृष्ण ही है, और योग की साधना उन्हीं के लिए होती है। समस्त कर्मों की पूर्णता भी श्रीकृष्ण में ही है। ज्ञान से ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण की प्राप्ति होती है, और तपस्या उनकी प्रसन्नता के लिए की जाती है। श्रीकृष्ण ही जीवन के प्रत्येक मार्ग का अंतिम ध्येय हैं।

जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना । श्रवन रंध्र अहिभवन समाना ॥
नयनन्हि संत दरस नहीं देखा ।।लोचन मोर पंख कर लेखा ॥

जिन्होने भगवान की कथा नहीं सुनी है उनके कान के छेद सांप के घर समान हैं । उनके आंख मोर के पंख के आंखो के समान हैं जिन्होने कभी संत का दर्शन नहीं किया है ।

चौथा प्रश्न- भगवान के उदार चरित्र जिसका गान बड़े-बड़े विद्वान करते हैं आप भगवान की लीलाओं का वर्णन कीजिए।


श्रीसूतजी कहते हैं—सृष्टि के प्रारंभ में, जब भगवान ने लोकों के निर्माण की इच्छा की, तो वह इच्छा मानो साक्षात् ब्रह्मांड के हर कण में प्रतिध्वनित होने लगी। उस एकमात्र संकल्प के साथ ही उन्होंने महत्तत्त्व और अन्य तत्वों से एक दिव्य पुरुषरूप धारण किया, जिसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत—इन सोलह कलाओं का अद्भुत संयोजन था। यह रूप सृष्टि की आधारशिला था, जिसमें समस्त शक्तियाँ समाहित थीं।


जब भगवान कारण जल में योगनिद्रा में शयन करने लगे, तब उनकी नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। वह कमल किसी साधारण पुष्प की भाँति नहीं था, बल्कि उसमें सृजन की अपार शक्ति छिपी थी। उसी कमल से स्वयं सृष्टिकर्ता, प्रजापतियों के अधिपति, ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी, जो इस समस्त संसार की रचना के लिए भगवान के द्वारा नियुक्त हुए, उनके जन्म की यह लीला परम रहस्यमयी और अद्वितीय हैl


इस क्षण में ब्रह्मांड की हर एक धड़कन में भगवान की लीला का स्पंदन था। सृष्टि का आरंभ इसी दिव्य संकल्प से हुआ, जिसमें भगवान के अपार प्रेम और शक्ति का अद्भुत समन्वय था।

पाँचवाँ प्रश्न- भगवान श्रीहरि के प्रमुख कितने अवतार हुए हैं ?

प्रभु की अनंत लीला और उनके अवतारों की महिमा इस ब्रह्मांड के कण-कण में बसी हुई है। हर अवतार में उन्होंने इस संसार के कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए, अपने दिव्य स्वरूप को प्रकट किया। उनकी ये अवतार कथाएँ हमारे जीवन को प्रकाशमान करने वाले दीपक हैं, जिनमें प्रभु के असीम प्रेम और शक्ति की झलक मिलती है।


1.पहला अवतार— प्रभु ने कौमारसर्ग में सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार के रूप में अवतार लिया। उन्होंने अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए संसार को ज्ञान और तपस्या का मार्ग दिखाया। इन चार ब्राह्मण रूपों में प्रभु का दर्शन सृष्टि के अनादिकाल से ही आत्मज्ञान और वैराग्य का संदेश देता है।


2. दूसरा अवतार— जब पृथ्वी रसातल में चली गई, तब भगवान ने यज्ञों के स्वामी सूकर रूप धारण कर पृथ्वी को उठाया और संसार को फिर से स्थिर किया। उनका यह वराह अवतार असीम करुणा और शक्ति का प्रतीक है, जिसमें उन्होंने सृष्टि की रक्षा के लिए अपना दिव्य रूप धारण किया।


तीसरा अवतार— देवर्षि नारद के रूप में प्रभु ने अवतार लेकर भक्ति और संगीत का अमृत संसार को प्रदान किया। नारदजी के रूप में उन्होंने भगवान की कथा और संगीत के माध्यम से भक्ति का प्रचार किया।


चौथा अवतार— धर्मपत्नी मूर्ति के गर्भ से नर-नारायण रूप में अवतार लेकर भगवान ने तपस्या की गहन महिमा को प्रकट किया। यह अवतार हमें जीवन में संयम और धैर्य की महत्ता सिखाता है।


पाँचवाँ अवतार— सिद्धों के स्वामी कपिल मुनि के रूप में अवतरित होकर उन्होंने सांख्य योग का उपदेश दिया। उनकी शिक्षाओं ने संसार को आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग दिखाया।


छठा अवतार— माता अनसूया की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने अत्रि ऋषि के पुत्र दत्तात्रेय के रूप में अवतार लिया। इस अवतार में उन्होंने संसार को योग, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत संगम दिया।


सातवाँ अवतार— रुचि प्रजापति की पत्नी आकृति से यज्ञ रूप में अवतरित होकर प्रभु ने सृष्टि की आधारशिला को सुदृढ़ किया। यज्ञ के रूप में उनका अवतरण संसार के कल्याण और संतुलन के लिए था।


आठवाँ अवतार— राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभदेव के रूप में प्रकट होकर भगवान ने त्याग और संन्यास की महिमा को स्थापित किया।


नौवाँ अवतार— ऋषियों की प्रार्थना पर राजा पृथु के रूप में अवतरित होकर उन्होंने पृथ्वी को दुहने का कार्य किया। इस अवतार में उन्होंने प्रजापालन और धर्म की स्थापना का संदेश दिया।


दसवाँ अवतार— जब चाक्षुष मन्वंतर के अंत में त्रिलोकी समुद्र में डूबने लगी, तब भगवान ने मत्स्य रूप धारण किया और वेदों की रक्षा की।


ग्यारहवाँ अवतार— जब देवता और दैत्य समुद्र मंथन कर रहे थे, तब भगवान ने कच्छप रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया और सृष्टि को स्थिर किया।


बारहवाँ अवतार— धन्वंतरि के रूप में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट होकर भगवान ने संसार को औषधियों का वरदान दिया।


तेरहवाँ अवतार— मोहिनी रूप में भगवान ने दैत्यों को मोहित करके देवताओं को अमृतपान कराया और उनका कल्याण किया।


चौदहवाँ अवतार— नरसिंह रूप धारण करके भगवान ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकशिपु का संहार किया। यह अवतार भक्त वत्सलता और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।


पंद्रहवाँ अवतार— वामन रूप धारण करके भगवान बलि के यज्ञ में पहुंचे और तीन पग भूमि मांगकर त्रिलोक को पुनः संतुलित किया।


सोलहवाँ अवतार— परशुराम रूप में उन्होंने जब देखा कि क्षत्रिय अधर्मी हो गए हैं, तब क्रोध में आकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया।


सत्रहवाँ अवतार— सत्यवती के गर्भ से पराशर ऋषि के द्वारा भगवान वेदव्यास के रूप में अवतरित हुए और वेदों का विभाजन कर संसार को ज्ञान का अमृत प्रदान किया।


अठारहवाँ अवतार— भगवान राम के रूप में अवतरित होकर उन्होंने धर्म की स्थापना की और राक्षसों का संहार किया। यह अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम की महिमा को प्रकट करता है।


उन्नीसवाँ और बीसवाँ अवतार— यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होकर भगवान ने पृथ्वी का भार उतारा और धर्म की स्थापना की।
हरी अवतार— गजेन्द्र की पुकार सुनकर भगवान ने उसे मुक्ति दिलाई, उनकी यह करुणा अनंत है।


हंसा अवतार— सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार को उपदेश देकर प्रभु ने ज्ञान और वैराग्य का मार्ग प्रशस्त किया।


अजन के पुत्र बुद्ध अवतार— जब संसार में हिंसा और अधर्म फैल गया, तब भगवान ने बुद्ध के रूप में अवतार लेकर करुणा और अहिंसा का संदेश दिया।


कल्कि अवतार— कलियुग के अंत में, जब अधर्म और अन्याय चरम पर होगा, तब भगवान विष्णु ब्राह्मण विष्णुयश के घर कल्कि रूप में अवतरित होकर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे।
भगवान के इन दिव्य अवतारों की कथा हमें यह सिखाती है कि जब भी संसार में अधर्म और अज्ञान बढ़ता है, तब प्रभु अवतार लेकर धर्म की रक्षा और भक्तों का कल्याण करते हैं।

अन्तिम प्रश्न- जब भगवान श्री हरि भगवान श्री कृष्ण चंद्र अपने धाम में चले गए तब—- धर्मं कं शरणं गतः
धर्म किसकी शरण में गया ?


इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।
उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानुऋषि:।
निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥
1.3.40
इदं भागवतं नाम
पुराणं ब्रह्म-सम्मितं
उत्तम-श्लोक-चरितं
चकार भगवान ऋषिः
निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं
स्वस्ति-अयनं महत्

इदम् – यह; भागवत – भगवान और उनके शुद्ध भक्तों के वर्णन वाली पुस्तक; नाम – नाम का; पुराणम् – वेदों का पूरक ; ब्रह्म – सम्मितम् – भगवान श्रीकृष्ण का अवतार; उत्तम – श्लोक – भगवान के व्यक्तित्व का; कारितम् – गतिविधियाँ; चकार – संकलित; भगवान – भगवान का अवतार; ऋषिः – श्री व्यासदेव; निश्श्रेयसाय – परम हित के लिए; लोकस्य – सभी लोगों का; धन्यम्- पूर्णतः सफल; स्वस्ति – अयनम् – सर्व-आनन्दमय; महत् – सर्व-परिपूर्ण।

यह श्रीमद-भागवतम भगवान का साहित्यिक अवतार है, और इसे भगवान के अवतार श्रील व्यासदेव द्वारा संकलित किया गया है।
(व्यास जी वशिष्ठ के प्रपौत्र, शक्ति के पौत्र एवं पराशर केपुत्र हैं)
व्यासाय विष्णु रूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥
(व्यासदेव स्वयं भगवान के अवतार हैं)

 यह भागवत पुराण सभी के परम कल्याण के लिए है। यह सर्व-सफल, सर्व-आनंददायक और सर्व-परिपूर्ण है। भगवान् वेदव्यास ने वेदों के समान भगवच्चरित्र से परिपूर्ण इस भागवत पुराण की रचना की है, जो आत्मा के उद्धार का मार्ग दिखाता है।


भगवतः इदं भागवतम।
इसके दो अर्थ निकलते हैं- भगवान के द्वारा कहा गया, भागवत और भगवान का जो है, भागवत। 


जब भगवान श्रीकृष्ण धर्म और ज्ञान के साथ अपने परमधाम पधार गए, तब कलियुग के अज्ञानरूपी अंधकार में डूबे लोगों के लिए यह भागवत पुराण सूर्य के समान प्रकट हुआ। शौनकादि ऋषियों! जब महातेजस्वी श्री शुकदेवजी महाराज इसकी कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ उपस्थित था और उनकी कृपा से इसे सुनकर इसका अध्ययन किया। अब जैसा मैंने समझा और ग्रहण किया, वैसा ही मैं आपको सुनाऊँगा।

शौनकजी बोले- सूतजी !

कस्मिन युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना |
कुतः सन्चोदितः कृष्णः कृतवान संहितां मुनिः || (1.4.3)

आप वास्तव में वक्ताओं में श्रेष्ठ और अत्यंत भाग्यशाली हैं, जो हमें वह पुण्यमयी कथा सुनाने का अवसर मिल रहा है, जो स्वयं भगवान श्री शुकदेवजी ने कही थी। कृपा करके आप भी वही भगवान की पावन कथा हमें सुनाइए, ताकि हमारे हृदय भी उस दिव्य आनंद और पुण्य से भर सकें।
कृपया बताइए, वह कथा किस युग में, किस पवित्र स्थान पर और किस कारण से हुई थी, ताकि हम उसकी गहनता और महत्व को समझ सकें और उसका पूरा लाभ प्राप्त कर सकें।
तब श्री सूतजी कहते हैं—–


द्वापरे समनुप्राप्तेते तृतीये युगपर्यये।
जात: पराशरौद्योगी वासव्यां कल्याण हरे: ||
(1.4.14)

सौऩक जी, द्वापर युग में महर्षि पाराशर और वसुकन्या सत्यवती के गर्भ से भगवान के कला अवतार श्री वेदव्यास जी ने जन्म लिया। वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे—भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता। जब उन्होंने भविष्य में कलियुग के प्राणियों की स्थिति पर दृष्टि डाली, तो देखा कि कलियुग में लोग कम बुद्धि, अल्पायु, भाग्यहीन और आलसी होंगे। उनके लिए धर्म और ज्ञान का मार्ग कठिन हो जाएगा। इस चिंता से प्रेरित होकर उन्होंने एक वेद को चार भागों में विभाजित किया—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।


उन्होंने ऋग्वेद अपने शिष्य महर्षि पैल को, सामवेद जैमिनि को, यजुर्वेद वैशम्पायन को और अथर्ववेद सुमन्तु ऋषि को प्रदान किया। परन्तु, वेदव्यास जी को अभी भी संतोष नहीं हुआ।


स्त्रीशूद्र द्विज बन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचराः | (1.4.25 )


उन्होंने सोचा कि स्त्री, शूद्र और अधम ब्राह्मणों का वेदों में अधिकार नहीं है। तब उन्होंने सर्वसाधारण के लिए एक लाख श्लोकों वाले महाभारत की रचना की, ताकि सबके लिए धर्म और ज्ञान का मार्ग खुल सके। फिर भी उनके हृदय में एक अजीब-सी अप्रसन्नता थी, जो उन्हें विचलित कर रही थी।


उसी समय देवर्षि नारद वहां पधारे। वेदव्यास जी ने नारद जी का पूजन किया, उन्हें आदरपूर्वक आसन पर बैठाया और अपनी व्याकुलता का कारण पूछा। वे बोले, “हे देवर्षि, मैंने वेदों को विभाजित किया, महाभारत की रचना की, फिर भी मैं इस अप्रसन्नता का कारण नहीं समझ पा रहा हूँ। आप ही इसका समाधान करें।”


तब नारदजी ने कहा, “हे पाराशर नंदन, आपकी अप्रसन्नता का कारण यह है कि आपने भगवान श्रीकृष्ण के निर्मल यश का गान पर्याप्त रूप से नहीं किया। वह ज्ञान भी जो मोक्ष का साक्षात साधन है, यदि भगवान की भक्ति से रहित हो, तो वह अधूरा ही रहता है। आपकी रचनाओं में भगवान की लीला और यश का विस्तार कम है, और यही कारण है कि संतोष नहीं हो रहा।”


नारदजी ने आगे कहा, “व्यासजी, भगवान की लीलाओं का वर्णन करना सर्वसाधारण के लिए परम कल्याणकारी होगा। जो मनुष्य अपने धर्म का त्याग करके भी भगवान के चरण-कमलों का भजन करता है, वह भगवान की कृपा से न केवल मोक्ष प्राप्त करता है, बल्कि उसका जीवन भी सफल हो जाता है। आप समाधि में जाकर भगवान की दिव्य लीलाओं का स्मरण कीजिए और उनकी कथा को विस्तारपूर्वक लिखिए। भगवान करुणामूर्ति हैं, वे अवश्य आपकी इस व्याकुलता को दूर करेंगे।”


नारदजी ने अंत में कहा, “व्यासजी, आप स्वयं भगवान के कला अवतार हैं। आपने अजन्मा होकर भी इस जगत के कल्याण के लिए जन्म लिया है। अब आप विशेष रूप से भगवान की लीलाओं का कीर्तन कीजिए, जिससे संसार का कल्याण हो और आपकी आत्मा भी पूर्ण संतोष प्राप्त करे।”
इस प्रकार नारदजी की प्रेरणा से वेदव्यास जी ने श्रीमद्भागवत की रचना की, जो भगवान की लीलाओं और यश का विस्तार करने वाला अमृतमय ग्रंथ है।

कीर्तन – श्रीमान नारायण नारायण
श्रीमन्नारायण नारायण नारायण नारायण ।
लक्ष्मीनारायण नारायण नारायण नारायण
बद्रीनारायण नारायण नारायण नारायण
मुक्तिनारायण नारायण नारायण नारायण
सत्यनारायण नारायण नारायण नारायण
गोदानारायण नारायण नारायण नारायण
वेंकटनारायण नारायण नारायण नारायण

अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने
दास्यस्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम्।
निरूपितो आयुध एव योगिनां
सुश्रुषेणे प्रवृषि निर्विक्षतम् ॥
1.5.23


अहम् – मैं; पुरा – पूर्व में; अतिता – भावे – पिछली सहस्राब्दी में; अभवम् – बन गया; मुने – हे मुनि ; दास्यः – दासी का; तू – परंतु; कश्यश्चन – निश्चित; वेद – वादिनाम् – वेदांत के अनुयायियों का; निरुपितः – लगे हुए; बालकः – बालक सेवक; इव – केवल; योगिनाम् – भक्तों का; शुश्रुषाणे – की सेवा में; प्रवृशि- वर्षा ऋतु के चार महीनों के दौरान; निर्विविष्टम् – एक साथ रहना 


पिछले कल्प में मैं एक वेदवादी ब्राह्मण की दासी का पुत्र था। योगी वर्षा ऋतु में चातुर्मास का अनुष्ठान कर रहे थे, और मैं बचपन से ही उनकी सेवा में नियुक्त था। यद्यपि मैं बालक था, फिर भी चंचलता से दूर, जितेन्द्रिय और एकाग्रचित्त था। मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया और उनके साथ समय बिताया।


समदर्शी मुनियों ने मेरे इस सरल स्वभाव को देखकर मुझ पर अनुग्रह किया। शरद और वर्षा की ऋतुओं में, उन महात्माओं ने श्रीहरि के निर्मल यश का कीर्तन किया, और मैं प्रेम से उनकी हर बात सुनता रहा। मेरी श्रद्धा गहरी थी, इन्द्रियों में संयम था, और शरीर, वाणी, मन से मैं उनका आज्ञाकारी था। मैंने समझा कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित होना ही इस संसार के तीनों तापों का एकमात्र उपचार है।


जब ज्ञानोपदेश देने वाले महात्मा चातुर्मास समाप्त कर जाने लगे, तब श्रीव्यासजी ने मुझसे पूछा, “नारदजी, जब आपके गुरु चले गए, तब आपने क्या किया?” उस समय मैं बहुत छोटा था, फिर भी मैं उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।


मेरी माँ का इकलौता पुत्र होने के नाते, वह एक साधारण स्त्री, मुर्ख और दासी थी। मेरी माँ ही मेरा सहारा थी, और उनकी सेवा की बात सुनकर मैं उदास हो गया। तब मुनियों ने मुझे एक मंत्र दिया, जिससे मुझे अपनी माँ की सेवा और भगवान की भक्ति में संतुलन बनाने का मार्ग मिला।
उनकी दी हुई विद्या और प्रेरणा ने मुझे संजीवनी दी, और मैं जान गया कि मेरी माँ की सेवा में ही मेरा सच्चा धर्म है। इस प्रकार, मैं अपनी माँ की भलाई के साथ-साथ भगवान की भक्ति को भी अपने हृदय में संजोये रहा।


मुनियों ने मुझे चतुरब्यूह मंत्र दिया और आशीर्वाद दिया कि इस जीवन में मुझे भगवान का दर्शन अवश्य होगा। मैं हर दिन इस मंत्र का जप करने लगा, मेरे हृदय में विश्वास और श्रद्धा की एक नई रोशनी भर गई।

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि |
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सकंर्षणाय च ||
(1.5.38)

एक दिन, मेरी माँ रात में गौ दुहने के लिए घर से बाहर निकली। अचानक उसके पैर से एक साँप छू गया और उसने उसे डस लिया। उस बेचारी पर तो काल की ऐसी ही प्रेरणा थी। मैंने समझा, यह भी भगवान का एक अनुग्रह है।


मैं उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। मार्ग में कई पर्वतों और वनों को पार करते हुए, एक स्थान पर पहुँच कर बहुत थक गया। वहाँ एक सरोवर में स्नान किया, जल पिया और पीपल के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गया। ऋषियों के उपदेश के अनुसार भगवान का ध्यान करने लगा। भगवत प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा से मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। उसी क्षण, भगवान का वास्तविक विग्रह मेरे हृदय में प्रकट हो गया, और मैं आनंदित हो गया। लेकिन वह छवि अचानक अंतर्ध्यान हो गई, जिससे मैं व्याकुल हो गया।


अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्।


तभी आकाशवाणी हुई: “वत्स! तुम अभी परिपक्व योगी नहीं हो। जब तुम सच्चे योगी बन जाओगे, तभी मुझे देख पाओगे।” मैंने कहा, “महाराज! जब मैं परिपक्व नहीं था, तो आपने मुझे दर्शन क्यों दिए? अब मैं उसके बिना नहीं रह सकता!”


आकाशवाणी ने उत्तर दिया, “तू बालक है! यदि बहुत समय बीत जाए, तो तेरी बुद्धि में भ्रम उत्पन्न हो सकता है। इसलिए, अभी भटकना नहीं। मेरा दर्शन प्रेम उत्पन्न करने और ऋषियों की वाणी को सत्य करने के लिए हुआ था। इस जन्म में मैं तुम्हें दर्शन नहीं दूंगा, लेकिन अगला जन्म मेरे नित्य पार्षद के रूप में होगा।”


इस आकाशवाणी को सुनकर, मैं निस्पृह होकर कार्य करने लगा। समय आने पर, मेरा पंचभौतिक शरीर छूट गया। जब भगवान नारायण ने सोने की इच्छा की, तब मैं ब्रह्मा जी के साथ उनके हृदय में प्रविष्ट हो गया। हजारों चतुर्युगों के बाद, पुनः सृष्टि हुई और मैं ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ। भगवान नारायण ने मुझे एक वीणा दी, जिसे बजाते हुए मैं निरंतर उनका कीर्तन करता रहा।


व्यास जी, आपने देखा? मैं एक दासी का पुत्र था और अब देवर्षि नारद बन गया। भगवान के नाम की महिमा अद्भुत है। इसी प्रकार, देवर्षि नारद वहाँ से चले गए।


अब सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर, व्यास जी का मन भगवान में समाहित हुआ और उन्होंने भागवत पुराण की रचना की। वे सोचने लगे कि इसका सबसे योग्य अधिकारी कौन है। उनकी दृष्टि अपने बेटे पर पड़ी। “यही सबसे योग्य है,” उन्होंने कहा। “जिसमें स्वार्थ, अहंकार या कोई विकार नहीं, वही इस रस को पूरी तरह से चख सकता है।” और तब उन्होंने शुकदेव जी को यह कथा सुनाई।

बोलिए राधे राधे


शौनक जी ने पूछा, “श्री शुकदेव जी तो निवृत्ति परायण हैं। वे जन्म लेते ही घर छोड़कर वन में चले गए थे, फिर उन्होंने इस श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन क्यों किया?”


श्रीसूत जी ने उत्तर दिया, “जो ज्ञानी हैं, जिनकी अविद्या की गाँठ खुल गई है, और जो सदा आत्मा में रमण करते हैं, वे भी भगवान की हेतुरहित भक्ति करते हैं; क्योंकि भगवान के गुण इतने मधुर हैं कि वे सबको अपनी ओर खींच लेते हैं। श्री शुकदेव जी तो स्वयं भगवान वेदव्यास के पुत्र हैं और भक्तों के प्रिय हैं। भगवान के गुणों ने उनके हृदय को अपनी ओर खींच लिया, और इसी विवशता में उन्होंने इस विशाल ग्रंथ का अध्ययन किया।”
व्यास जी ने अपने शिष्यों को भागवत के कुछ श्लोक याद करवाए। वे जब वन में जाते, तो जोर-जोर से भागवत के श्लोक गाते। एक दिन, वे उसी वन में पहुँचे जहाँ श्री शुकदेव जी ध्यान में बैठे थे। तभी एक शिष्य के मुख से एक श्लोक निकला, और उसकी मधुरता ने वातावरण को मंत्रमुग्ध कर दिया।


वहाँ की शांति में, उस श्लोक की गूंज से ऐसा लगा जैसे समस्त वन और जीव-जंतु भी भगवान की महिमा में मग्न हो गए हों। उस पल, श्री शुकदेव जी की आँखें खुल गईं, और उन्होंने ध्यान से उन भक्तों की भक्ति का अनुभव किया। उनकी भक्ति की शक्ति ने न केवल उन्हें, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को भी छू लिया।


बर्हापीडं नटवरवपु: कर्णयो: कर्णिकारं
बिभ्रद् वास: कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै-
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्ति:
10.21.5


भगवान श्री कृष्ण गोप ग्वाल गायों के साथ वृंदावन में प्रवेश कर रहे हैं और सभी सखा गण उनके कीर्ति का गुणगान कर रहे हैं उनकी जय-जयकार कर रहे हैं, उस समय भगवान श्री कृष्ण की बड़ी दिव्य शोभा हुई |

व्यास जी ने दुसरे शिष्य को दूसरा श्लोक सिखाया |

अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी |
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ||3/2/23

अर्थ: यह भगवान श्रीकृष्ण की आश्चर्यमयी लीला है कि राक्षसी पूतना, जो अपने स्तनों में कालकूट नामक भयंकर विष लगा कर छोटे-छोटे बच्चों को मारने आई थी, उसने एक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। पूतना ने कन्हैया को उठाया और एकांत स्थान पर जाकर अपने विष से भरे स्तन को कन्हैया के मुख में दे दिया। उसका उद्देश्य था भगवान को विष देकर मारना, लेकिन दयालु कन्हैया ने उसके बुरे स्वभाव पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि इसने मातृभाव से सेवा की है, इसलिए इसे भी माता की गति देनी चाहिए।
कृष्ण ने पूतना को वह दिव्य गति प्रदान की, जो बाद में यशोदा माँ को मिलनी थी। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण की दया अपार है।

पूतना, जो पिछले जन्म में राजा बलि की पुत्री रत्नावली थी, ने भगवान वामन को देख कर वात्सल्य भाव से उन्हें दूध पिलाने की इच्छा जताई थी। लेकिन जब भगवान ने बलि को पाताल में डाल दिया, तो रत्नावली ने क्रोध में आकर कहा कि उसे जहर देना चाहिए। उसी क्रोध के फलस्वरूप आज वही रत्नावली पूतना बनकर भगवान को दूध पिलाने आई।


ये बातें सुनकर श्री शुकदेव जी खड़े हो गए और बोले, “आप बहुत सुंदर श्लोक सुनाते हैं, कुछ और सुनाइए।”
व्यास जी के शिष्य बोले, “हमें तो इतना ही आता है, यदि आपको और सुनने की इच्छा है, तो चलिए हमारे गुरु देव के पास। उनके पास 18,000 श्लोक हैं।”


शुकदेव जी ने पूछा, “आपके गुरु कौन हैं?” शिष्यों ने कहा, “हमारे गुरु देव श्री वेदव्यास जी हैं।”


जैसे ही शुकदेव जी ने व्यास जी का नाम सुना, वे प्रसन्न हो गए और बोले, “वह तो मेरे पिताजी हैं!” तुरंत बिना देर किए वे अपने पिताजी के पास चल पड़े और इस विशाल ग्रंथ का अध्ययन किया।


भगवान श्रीकृष्ण की लीला और वेदव्यास जी की महिमा के प्रति उनका यह प्रेम और श्रद्धा सच्ची भक्ति का प्रमाण है।

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