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श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रथम श्लोक (मंगलाचरण)

श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रथम श्लोक (मंगलाचरण) अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक अर्थ वाला है। यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और उनकी महिमा का वर्णन करता है। पहला श्लोक निम्नलिखित है:

श्रीमद्भागवत महापुराण – प्रथम स्कंध, प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक:

“जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतः चार्थेष्वभिज्ञः स्वरत्।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः॥
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥”

हिंदी अनुवाद:

जिससे इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और संहार होता है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सभी के स्वामी और सर्वज्ञ हैं, जिनसे वेदों का प्राकट्य हुआ है, और जिनके कारण बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं — हम उस परम सत्य, परब्रह्म श्रीहरि का ध्यान करते हैं।

जो सृष्टि में अग्नि, जल, और पृथ्वी की भाँति सभी तत्वों का विनिमय करवाते हैं और जिनके धाम में माया का कोई प्रवेश नहीं है, ऐसे सच्चिदानंद रूप परमात्मा के सच्चे स्वरूप को हम अपने हृदय में स्थिर करें।

यह श्लोक श्रीमद्भागवत की मूल भक्ति भावना और भगवान की परम सत्ता की ओर संकेत करता है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, संरक्षण, और संहार में भगवान की भूमिका, साथ ही उनके दिव्य गुणों का वर्णन है।

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